चेन्नई। तमिलनाडु के समुद्री तट से जुड़ा प्राचीन शहर पूम्पुहार एक बार फिर पुरातत्व और इतिहास के क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। कभी दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक केंद्रों में गिने जाने वाले इस शहर के अवशेष आज बंगाल की खाड़ी की तलहटी में मौजूद हैं। हालिया समुद्री सर्वेक्षण में मिले अवशेषों ने शोधकर्ताओं को इस प्राचीन बंदरगाह की गतिविधियों और उसके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों को समझने के लिए नए सुराग दिए हैं। तमिलनाडु पुरातत्व विभाग की टीम ने समुद्र के भीतर करीब दो सप्ताह तक अभियान चलाया। इस दौरान तट से लगभग दो किलोमीटर दूर समुद्र में बड़ी संख्या में मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े और कुछ प्राचीन संरचनाओं से जुड़े साक्ष्य दर्ज किए गए। खोज में मिले अलग-अलग प्रकार के बर्तनों ने इस क्षेत्र के पुराने समुद्री संपर्कों को लेकर शोध की संभावनाएं बढ़ा दी हैं।
मिले ऐसे बर्तन, जो दूर-दराज के व्यापार की कहानी बताते हैं
अभियान के दौरान मिले टॉरपीडो जार विशेष रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। आकार में लंबे और संकरे इन पात्रों का इस्तेमाल प्राचीन व्यापारिक नेटवर्क में विभिन्न वस्तुओं के परिवहन के लिए किया जाता था। ऐसे अवशेष पश्चिम एशिया और फारस की खाड़ी से जुड़े समुद्री व्यापार के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। इसके अलावा चमकदार सतह वाली ग्लेज्ड पॉटरी के टुकड़े भी मिले हैं। इनसे प्राचीन ईरान और दक्षिण भारत के बीच संभावित व्यापारिक संपर्कों की पड़ताल को आधार मिलता है। वहीं पैडल-इम्प्रेस्ड पॉटरी के अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि पूम्पुहार का संपर्क केवल समुद्री मार्गों तक सीमित नहीं था, बल्कि उत्तर भारत के गंगा क्षेत्र से भी व्यापारिक संबंध हो सकते थे। शोधकर्ताओं को चूना पत्थर के कुछ अवशेष भी मिले हैं। इनका संबंध आंध्र प्रदेश के अमरावती क्षेत्र की प्राचीन बौद्ध परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि इन सभी संबंधों की पुष्टि के लिए विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन जरूरी होगा।
समुद्र की गहराई में मिली विशाल संरचना
पूम्पुहार की समुद्री विरासत की खोज आज की नहीं है। वर्ष 1991 में खोजकर्ताओं ने तट से करीब 5.5 किलोमीटर दूर और लगभग 23 मीटर की गहराई पर समुद्र की तलहटी में एक बड़ी संरचना दर्ज की थी। अध्ययनों में इसे लगभग 40 मीटर लंबी और 16 मीटर चौड़ी अंडाकार संरचना के रूप में वर्णित किया गया। यह समुद्र की तलहटी से करीब 2.5 मीटर तक ऊपर उठी हुई दिखाई देती है और इसमें बड़े पत्थर के ब्लॉकों का इस्तेमाल नजर आता है। इस संरचना का वास्तविक उपयोग और निर्माणकाल अब भी पुरातत्वविदों के लिए अध्ययन का विषय है।
साहित्य में भी दर्ज है पूम्पुहार का वैभव
पूम्पुहार को सिर्फ समुद्र के नीचे मिले अवशेषों से नहीं जाना जाता। तमिल साहित्य में भी इस नगर का उल्लेख मिलता है। ‘सिलप्पतिकारम’ और ‘मणिमेगलाई’ जैसे प्रसिद्ध तमिल महाकाव्यों में इस शहर का वर्णन किया गया है। ऐतिहासिक स्रोतों में इसे कावेरीपट्टिनम और कावेरीपूमपट्टिनम जैसे नामों से भी जाना जाता है। ग्रीक-रोमन लेखों में इसके साथ जोड़े जाने वाले नाम और विवरण यह संकेत देते हैं कि प्राचीन काल में यह दक्षिण भारत के समुद्री व्यापार तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा होगा।
आखिर पानी के नीचे कैसे पहुंचा शहर?
पूम्पुहार के समुद्र में समाने की कहानी अब भी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। पुरातत्वविदों और भूवैज्ञानिक अध्ययनों में समुद्री कटाव, तटीय बदलाव और संभावित सुनामी जैसी प्राकृतिक घटनाओं को इसके विनाश से जोड़कर देखा गया है। अलग-अलग समय में समुद्र के आगे बढ़ने से शहर के तटीय हिस्से प्रभावित होते गए होंगे।इस बदलाव को समझने के लिए आसपास के तटीय क्षेत्र के वर्तमान अवशेष भी महत्वपूर्ण हैं। वनागिरी का एल्लईअम्मन मंदिर इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण बताया जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, कुछ दशक पहले तक इस्तेमाल में रहा यह मंदिर आज समुद्र के भीतर दिखाई देता है। इससे इस क्षेत्र में लंबे समय से जारी तटीय भू-परिवर्तनों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इतिहास के कई सवाल अभी बाकी
पूम्पुहार की समुद्री खोज ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि प्राचीन दक्षिण भारत के बंदरगाह वास्तव में कितने बड़े और कितने दूर तक फैले व्यापारिक नेटवर्क से जुड़े थे। समुद्र की तलहटी से मिले बर्तन, संरचनाएं और अन्य सामग्री इस दिशा में महत्वपूर्ण सुराग दे सकती हैं। लेकिन इन अवशेषों की उम्र, उनका सटीक स्रोत और पूम्पुहार के व्यापारिक नेटवर्क से उनका संबंध स्थापित करने के लिए आगे पुरातात्विक, भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक होंगे। यानी समुद्र के नीचे दबा पूम्पुहार सिर्फ एक डूबे हुए शहर की कहानी नहीं है। यह प्राचीन दक्षिण भारत की समुद्री गतिविधियों, दूर-दराज के क्षेत्रों से उसके संपर्क और बदलती तटीय भौगोलिक परिस्थितियों को समझने की एक बड़ी खिड़की भी साबित हो सकता है।