डेस्क। दार्जिलिंग लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी का वर्चस्व इतना गहरा है कि इसे पश्चिम बंगाल में भगवा दल का “अभेद किला” माना जाता है। इस क्षेत्र की राजनीतिक जटिलताओं और भाजपा के दबदबे के कारण ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अक्सर सीधे चुनावी मैदान में उतरने के बजाय क्षेत्रीय सहयोगियों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। ममता दार्जिलिंग के पहाड़ों क्षेत्र में उतरी पार्टियों में अनित थापा की BGPM को सपोर्ट कर रही हैं. इस बार के चुनाव में गोरखा समुदाय के बीचपंचकोणीय मुकाबला है. BGPM को ममता, GJM को बीजेपी और एक नई पार्टी IGJF के उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। साथ ही अन्य पार्टियां भी मैदान में हैं
पहचान की राजनीति हावी
दार्जिलिंग की पहाड़ियों में हमेशा से पहचान की राजनीति हावी रही है। गोरखालैंड के नारे दशकों तक यहां की सियासत का केंद्र रहे हैं। लेकिन 2026 के चुनाव में तस्वीर बदलती नजर आ रही है, जहां मुख्य मुद्दा अब प्रशासन, अधिकार और न्यूनतम मजदूरी बन गया है। टॉय ट्रेन की आवाज और माल रोड की चहल-पहल के बीच इस बार सियासी चर्चा जमीन के पट्टे और चाय बागान मजदूरों के अधिकारों पर केंद्रित है। पहाड़ी क्षेत्रों की सीटों पर इस बार सीधा और बहुकोणीय मुकाबला देखने को मिल रहा है।
गोरखालैंड बनाम विकास का बदलता मुद्दा
दार्जिलिंग और आसपास के इलाकों में गोरखालैंड आंदोलन लंबे समय तक राजनीतिक पहचान का आधार रहा है। लेकिन अब दीवारों पर लिखे नारे धुंधले पड़ चुके हैं और उनकी जगह पर्चा-पट्टा और न्यूनतम मजदूरी जैसे ठोस मुद्दों ने ले ली है। चाय बागानों में काम करने वाली महिलाओं और श्रमिकों की मांग स्पष्ट है कि उन्हें केवल वादे नहीं, बल्कि अधिकार चाहिए। यह बदलाव संकेत देता है कि मतदाता अब भावनात्मक मुद्दों के बजाय व्यावहारिक जरूरतों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पंचकोणीय मुकाबले से बदला समीकरण
इस बार चुनावी मुकाबला पारंपरिक दो दलों तक सीमित नहीं है, बल्कि पांच प्रमुख ताकतें मैदान में हैं। भाजपा गठबंधन, जो पिछले चुनावों में मजबूत स्थिति में रहा है, अब भी अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। वहीं तृणमूल कांग्रेस समर्थित अनित थापा विकास और प्रशासनिक सुधार के एजेंडे के साथ उभरे हैं। अजय एडवर्ड्स ने एक अलग मोर्चा बनाकर मुकाबले को और जटिल बना दिया है। इसके अलावा वाम दल, आइएसएफ और कांग्रेस भी अपनी जमीन तलाशने में जुटे हैं, जिससे चुनावी गणित और पेचीदा हो गया है।
चाय बागान श्रमिक बने किंगमेकर
सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार के चाय बागानों में रहने वाले लाखों श्रमिक इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। इनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा न्यूनतम मजदूरी और जमीन का मालिकाना हक है। एक महिला श्रमिक का कहना है कि चुनाव आते जाते रहते हैं, लेकिन उनकी समस्याएं अब भी हल नहीं हुई हैं। यही वर्ग इस बार सत्ता का रुख तय कर सकता है। 23 अप्रेल को होने वाला मतदान यह तय करेगा कि पहाड़ की जनता भावनात्मक मुद्दों को चुनती है या अपने हक और विकास को प्राथमिकता देती है।
दार्जिलिंग की अहमियत
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल का एक खूबसूरत जिला, राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां बीजेपी की मौजूदगी इतनी मजबूत है कि ममता बनर्जी भी चुनावी मुकाबले में सीधे नहीं उतरती हैं। दार्जिलिंग की राजनीतिक स्थिति, जो कि पहाड़ियों और मैदानी इलाकों को जोड़ती है, 2026 के विधानसभा चुनाव में अहम भूमिका निभाने जा रही है। मौजूदा समय में चुनावी माहौल गर्म है और सभी दल अपनी पूरी ताकत लगा रहे हैं।
बीजेपी की सत्ता का राज
2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां अपनी स्थिति को मज़बूत किया था। गोरखा पार्टियों के समर्थन से बीजेपी के उम्मीदवारों ने कई सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार भी बीजेपी का दार्जिलिंग क्षेत्र में दबदबा साफ नजर आ रहा है। 2014 के बाद से, बीजेपी उम्मीदवारों ने लगातार दार्जिलिंग सीट को जीता है। इस क्षेत्र में बीजेपी का समर्थन गोरखा समुदाय से भी है।
दार्जिलिंग सीट पर भाजपा का 2009 से अटूट कब्जा
2009: जसवंत सिंह की जीत के साथ भाजपा ने पहली बार यहाँ पैर जमाए।
2014: एस.एस. अहलूवालिया ने इस जीत को बरकरार रखा।
2019: राजू बिस्टा ने टीएमसी के अमर सिंह राय को 4.13 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराकर जीत दर्ज की।
2024: राजू बिस्टा ने फिर से टीएमसी के गोपाल लामा को 1.78 लाख से अधिक वोटों से हराकर यह सीट चौथी बार भाजपा की झोली में डाली।
गोरखा समुदाय का विश्वास
गोरखा पार्टियों, जैसे कि GJM और GNLF, ने लंबे समय से बीजेपी पर भरोसा जताया है। भाजपा ने हमेशा गोरखाओं की अलग पहचान और “स्थायी राजनीतिक समाधान” (Permanent Political Solution) का वादा किया है, जो यहाँ के मतदाताओं के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भाजपा को पारंपरिक रूप से बिमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) और गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा (GNFM) जैसे शक्तिशाली समूहों का समर्थन मिलता रहा है।
राज्य सरकार विरोधी भावना
पहाड़ी क्षेत्रों में अक्सर राज्य की तृणमूल सरकार के प्रति अविश्वास देखा गया है, जिसका सीधा लाभ भाजपा को “विकल्प” के रूप में मिलता है। ये पार्टियां मौजूदा सरकार की नीतियों से नाखुश हैं और एक अलग गोरखा राज्य की मांग कर रही हैं। ममता बनर्जी की पार्टी ने BGPM को समर्थन देकर उनके लिए भी संभावनाएं पैदा की हैं। इस बार के चुनाव में, गोरखा समुदाय के बीच त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिलेगा।
ममता बनर्जी और टीएमसी की ‘बैकफुट’ रणनीति
पश्चिम बंगाल के अन्य हिस्सों में मजबूत होने के बावजूद, ममता बनर्जी दार्जिलिंग में “सीधी टक्कर” से बचती रही हैं। टीएमसी अक्सर अपने उम्मीदवार उतारने के बजाय स्थानीय गोरखा दलों (जैसे अनित थापा की भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा – BGPM) के उम्मीदवारों का समर्थन करती है। पहाड़ों में टीएमसी का अपना संगठनात्मक ढांचा भाजपा और स्थानीय गोरखा समूहों की तुलना में कमजोर रहा है, जिससे वे चुनावी मैदान में सीधे उतरने के बजाय गठबंधन को प्राथमिकता देती हैं।
आरएसएस की भूमिका
आसपास के क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता का एक बड़ा कारण आरएसएस की मेहनत है। पिछले कुछ वर्षों में आरएसएस ने पहाड़ों में प्रभावशाली नेटवर्क बनाया है, जिससे बीजेपी ने अन्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले मजबूत स्थिति हासिल की है। इस रणनीति के माध्यम से बीजेपी ने गोरखा समुदाय में अपनी पैठ बढ़ाई है।
गृह मंत्री अमित शाह का वादा
अमित शाह ने हाल ही में दार्जिलिंग में गोरखाओं से वादा किया है कि भाजपा की सरकार बनने पर गोरखा आंदोलनकारियों पर दर्ज केस वापस लिए जाएंगे और उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता होगी। गृह मंत्री अमित शाह द्वारा गोरखा लैंड मुद्दे के स्थायी राजनीतिक समाधान का वादा एक महत्वपूर्ण पहल हो सकता है। यह वादा गोरखा पार्टियों के लिए आकर्षण का विषय बन गया है और इससे बीजेपी की स्थिति और मजबूत होने की संभावनाएं हैं। इस चुनावी माहौल में सभी दल अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं।
चुनाव की तैयारी
बंगाल में 23 अप्रैल को होने वाले चुनाव में दार्जिलिंग की सीट महत्वपूर्ण होगी। बीजेपी के समर्थक, गोरखा पार्टियों और ममता बनर्जी की समर्थक पार्टी BGPM के मध्य एक रोचक मुकाबला होने की संभावना है। सभी राजनीतिक दल अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। दार्जिलिंग की चुनावी तस्वीर और भी दिलचस्प बनती जा रही है। 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए भी यहाँ मुकाबला दिलचस्प होता दिख रहा है।