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शुभेंदु सरकार को बड़ा झटका : बंगाल के ‘एंटी-गुंडा बिल’ पर राष्ट्रपति की आपत्ति, NDPS कानून से टकराव के चलते पुनर्विचार के लिए लौटाया

पश्चिम बंगाल सरकार के बहुचर्चित ‘एंटी-गुंडा बिल’ को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी नहीं दी है। केंद्र की ओर से कानून के एक प्रावधान और नशीले पदार्थों से जुड़े केंद्रीय कानूनों के बीच संभावित टकराव की ओर ध्यान दिलाए. . .

कोलकाता/नई दिल्ली, 25 सितंबर 2026: पश्चिम बंगाल सरकार के बहुचर्चित ‘एंटी-गुंडा बिल’ को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी नहीं दी है। केंद्र की ओर से कानून के एक प्रावधान और नशीले पदार्थों से जुड़े केंद्रीय कानूनों के बीच संभावित टकराव की ओर ध्यान दिलाए जाने के बाद बिल को पुनर्विचार के लिए राज्य सरकार के पास वापस भेज दिया गया है। यह बिल ‘द वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल, 2026’ के नाम से जून में विधानसभा से पारित हुआ था। इसके तहत कथित असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए निवारक हिरासत समेत कई कड़े प्रावधान प्रस्तावित किए गए थे। विधानसभा में बिल 176-41 के वोट से पारित हुआ था और 20 सदस्यों ने मतदान से दूरी बनाई थी।

आखिर क्यों लौटाया गया बिल?

राष्ट्रपति के पास भेजे गए बिल पर केंद्र सरकार ने मुख्य आपत्ति उसके उस प्रावधान को लेकर जताई, जिसमें NDPS Act, 1985 के तहत दंडनीय अपराधों में शामिल होने, उनका प्रयास करने, उकसाने, बढ़ावा देने, वित्तपोषण करने या मदद करने वाले व्यक्ति को ‘गुंडा’ की परिभाषा के दायरे में लाया गया था। केंद्र के मुताबिक, यह प्रावधान Prevention of Illicit Traffic in Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act (PITNDPS), 1988 के तहत मौजूद निवारक हिरासत व्यवस्था से ओवरलैप कर सकता है। PITNDPS Act विशेष रूप से मादक पदार्थों की अवैध तस्करी में शामिल लोगों की निवारक हिरासत से संबंधित केंद्रीय कानून है। केंद्र की आपत्ति का मूल सवाल यह है कि एक ही तरह की गतिविधियों को लेकर राज्य कानून और केंद्रीय कानून समानांतर निवारक हिरासत व्यवस्था न बना दें। इसी संभावित टकराव को देखते हुए बिल को दोबारा विचार के लिए लौटाया गया है।

Article 254 का भी आया मुद्दा

इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 254 का भी महत्व है। यह प्रावधान उस स्थिति से संबंधित है जब समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य का कानून केंद्रीय कानून से टकराता है। केंद्र की ओर से दिए गए नोट में कहा गया कि NDPS से संबंधित प्रावधान को हटाने पर इस तरह के संभावित ओवरलैप से बचा जा सकता है। यानी फिलहाल आपत्ति पूरे बिल के ढांचे पर नहीं, बल्कि खास तौर पर NDPS से जुड़े प्रावधान पर केंद्रित बताई गई है।

क्या बदलाव करना चाहती है सरकार?

राज्य सरकार से जुड़े एक अधिकारी के हवाले से रिपोर्ट में कहा गया है कि बिल में जरूरी संशोधन किए जाने के बाद इसे विधानसभा में दोबारा पेश किया जा सकता है। संशोधित बिल विधानसभा से पारित होने के बाद फिर से राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे जाने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि राष्ट्रपति द्वारा बिल लौटाए जाने से प्रस्तावित कानून की प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई है। अब राज्य सरकार को केंद्र की आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए आगे की विधायी प्रक्रिया तय करनी होगी।

‘एंटी-गुंडा बिल’ में क्या-क्या प्रावधान थे?

जून में पारित बिल का उद्देश्य राज्य में सार्वजनिक सुरक्षा और शांति व्यवस्था बनाए रखने तथा कथित असामाजिक गतिविधियों को रोकना था। आधिकारिक बिल के पाठ में सार्वजनिक सुरक्षा, शांति और व्यवस्था तथा असामाजिक गतिविधियों की रोकथाम को इसका उद्देश्य बताया गया है। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्तावित कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में ‘गुंडा’ माने जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ 12 महीने तक निवारक हिरासत का प्रावधान था। विधानसभा से पारित कानून में पुलिस और प्रशासन को व्यापक अधिकार देने की बात भी शामिल थी। इसके अलावा प्रस्तावित व्यवस्था में संबंधित व्यक्ति को किसी खास इलाके, जिले या जिलों से बाहर जाने का आदेश देने और एक निर्धारित अवधि तक उस क्षेत्र में वापस आने से रोकने जैसे प्रावधान भी बताए गए हैं।

किन अधिकारियों को कार्रवाई का अधिकार?

बिल के प्रावधानों के मुताबिक, यदि संबंधित अधिकारी को यह आशंका हो कि कोई व्यक्ति असामाजिक गतिविधियों में शामिल है या उसके शामिल होने की संभावना है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसके खिलाफ आदेश जारी किया जा सकता है। ऐसे मामलों में जिला मजिस्ट्रेट, पुलिस कमिश्नर या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत डीआईजी स्तर के अधिकारी की भूमिका प्रस्तावित की गई थी। प्रस्तावित व्यवस्था में संबंधित व्यक्ति को अपनी गतिविधियों या मौजूदगी की जानकारी भी निर्धारित तरीके से और निर्धारित अधिकारी को देने के लिए कहा जा सकता था।

विधानसभा में विपक्ष ने किया था विरोध

बिल को विधानसभा में पेश किए जाने के समय विपक्ष की ओर से इसके प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए गए थे। सरकार ने हालांकि इसे सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से जरूरी बताया था। आकाशवाणी की रिपोर्ट के अनुसार, विधानसभा में बिल 176-41 के मत से पारित हुआ था। सरकार ने इसे असामाजिक गतिविधियों पर रोक लगाने, ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने और सार्वजनिक शांति बनाए रखने की जरूरत से जोड़ा था।

सरकार ने कहा था- राजनीतिक बदले के लिए इस्तेमाल नहीं होगा

बिल पर चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर उठाई गई चिंताओं पर कहा था कि प्रशासन कानून के मुताबिक काम करेगा और कानून का गलत इस्तेमाल नहीं किया जाएगा। सरकार का तर्क रहा है कि कानून का उद्देश्य राजनीतिक गतिविधियों को निशाना बनाना नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़ी समस्याओं से निपटना है।

कलकत्ता हाई कोर्ट में भी पहुंचा था मामला

बिल के प्रावधानों को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट में कई जनहित याचिकाएं दायर की गई थीं। 6 अगस्त 2026 को जस्टिस तपब्रत चक्रवर्ती और जस्टिस पार्थ सारथी चटर्जी की डिवीजन बेंच ने तीन PIL खारिज कर दी थीं। अदालत ने याचिकाओं को समय से पहले माना, क्योंकि उस समय बिल को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिली थी। राज्य की ओर से अदालत को भी बताया गया था कि बिल अभी राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में है। यही वजह है कि बिल को लेकर उस समय एक अहम कानूनी स्थिति साफ हुई थी—विधानसभा से पारित होना अपने आप में किसी बिल को लागू कानून नहीं बना देता। राष्ट्रपति की मंजूरी और उसके बाद आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।

पहले ‘मंजूरी’ को लेकर भी उठा था विवाद

बिल को लेकर अगस्त में उस समय भी विवाद हुआ था, जब मुख्यमंत्री की ओर से इसे लागू किए जाने की बात कही गई थी। बाद में अदालत में राज्य सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि बिल अभी राष्ट्रपति की मंजूरी की प्रतीक्षा में था। अब राष्ट्रपति द्वारा इसे पुनर्विचार के लिए लौटाए जाने से यह स्थिति और स्पष्ट हो गई है कि मौजूदा बिल को अभी अंतिम कानूनी मंजूरी नहीं मिली है।

अब आगे क्या होगा?

राष्ट्रपति की आपत्ति के बाद राज्य सरकार के सामने मुख्य रूप से बिल के NDPS से जुड़े प्रावधान पर पुनर्विचार का मुद्दा है। केंद्र की ओर से सुझाए गए बदलाव के अनुसार NDPS Act के तहत अपराधों के संदर्भ को संबंधित परिभाषा से हटाने पर विचार किया जा सकता है। इसके बाद राज्य सरकार संशोधित विधेयक को विधानसभा में ला सकती है। विधानसभा की प्रक्रिया पूरी होने के बाद इसे दोबारा राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजे जाने की संभावना है। इस पूरे घटनाक्रम में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रपति ने बिल को खारिज करने के बजाय पुनर्विचार के लिए वापस भेजा है, और केंद्र की आपत्ति मुख्य रूप से राज्य के प्रस्तावित प्रावधान तथा पहले से मौजूद केंद्रीय निवारक हिरासत कानून के संभावित ओवरलैप को लेकर

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