1999 से चली आ रही कवायद फिर चर्चा में, शमिक भट्टाचार्य के ऐलान के बाद गरमाई सियासत; क्या सुवेंदु अधिकारी सरकार केंद्र की मंजूरी तक पहुंचा पाएगी फाइल?
कोलकाता : पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की बहस एक बार फिर राज्य की राजनीति के केंद्र में आ गई है। करीब 27 साल से अलग-अलग सरकारों द्वारा नाम बदलने की कोशिश के बाद अब भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के दौर में यह मुद्दा नए सिरे से सामने आया है। पश्चिम बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद शमिक भट्टाचार्य ने सोमवार को संकेत दिया कि मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार जल्द ही विधानसभा में राज्य का नाम बदलने से जुड़ा विधेयक ला सकती है। प्रस्ताव के मुताबिक, ‘West Bengal’, ‘Bangla’ या ‘Bengal’ जैसे अलग-अलग नामों के बजाय राज्य के लिए ‘पश्चिम बंग’ नाम को आधिकारिक रूप से इस्तेमाल करने की तैयारी है। लेकिन बड़ा सवाल यही है—क्या इस बार नाम बदलने की कोशिश विधानसभा की दीवारों से निकलकर संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी तक पहुंच पाएगी?
क्या अब ‘West Bengal’ नहीं, हर भाषा में होगा ‘पश्चिम बंग’?
शमिक भट्टाचार्य के मुताबिक, सरकार की मंशा राज्य के लिए अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम इस्तेमाल करने की व्यवस्था को खत्म करने की है। प्रस्तावित व्यवस्था में एक ही आधिकारिक नाम रखने की बात कही जा रही है। यानी अंग्रेजी प्रशासनिक दस्तावेजों में भी मौजूदा ‘West Bengal’ नाम की जगह प्रस्तावित नाम इस्तेमाल करने की दिशा में कदम बढ़ सकता है। हालांकि, अभी यह फैसला कानूनी रूप से लागू नहीं हुआ है। फिलहाल राज्य का आधिकारिक नाम पश्चिम बंगाल ही है और प्रस्तावित बदलाव को प्रभावी होने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया से गुजरना होगा।
आखिर ‘पश्चिम बंग’ ही क्यों? क्या है इसके पीछे का इतिहास?
नाम बदलने के पीछे सबसे बड़ा तर्क बंगाल के विभाजन और उससे जुड़ी ऐतिहासिक स्मृतियों का दिया जा रहा है। 1947 में भारत के विभाजन के दौरान बंगाल भी विभाजित हुआ था। इसका पश्चिमी हिस्सा भारत का हिस्सा बना और आगे चलकर पश्चिम बंगाल के नाम से जाना गया। भाजपा लंबे समय से यह तर्क देती रही है कि ‘पश्चिम बंगाल’ नाम केवल एक प्रशासनिक पहचान नहीं, बल्कि विभाजन, विस्थापन और लाखों लोगों के संघर्ष की ऐतिहासिक स्मृति से भी जुड़ा है। इसी वजह से ‘बांग्ला’ नाम के बजाय ‘पश्चिम बंग’ को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है।
1999 में पहली बार उठा था मुद्दा, फिर क्यों नहीं बदला नाम?
राज्य का नाम बदलने की कहानी आज की नहीं है। इसकी शुरुआत करीब 1999 में वाम मोर्चा सरकार के दौर में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व वाली सरकार के समय प्रशासनिक सुविधा और अंग्रेजी वर्णक्रम के आधार पर राज्य का नाम बदलने की चर्चा शुरू हुई। ‘पश्चिम बंग’ और ‘बांग्ला’ जैसे नामों पर विचार हुआ। लेकिन प्रस्ताव केंद्र तक पहुंचने के बाद मामला आगे नहीं बढ़ सका। यानी पहली कोशिश के बाद भी पश्चिम बंगाल का नाम पश्चिम बंग नहीं बन पाया।
ममता बनर्जी सरकार ने फिर क्यों उठाया नाम बदलने का मुद्दा?
2011 में सत्ता परिवर्तन के बाद ममता बनर्जी सरकार ने भी राज्य का नाम बदलने की कोशिश की। इस बार इसके पीछे एक प्रमुख प्रशासनिक तर्क था—अंग्रेजी वर्णमाला में ‘West Bengal’ का W से शुरू होना। राज्यों से जुड़ी राष्ट्रीय बैठकों और केंद्र-राज्य समन्वय कार्यक्रमों में अंग्रेजी वर्णक्रम के कारण पश्चिम बंगाल की बारी अक्सर आखिर में आती थी। सरकार का तर्क था कि इससे कई महत्वपूर्ण बैठकों में राज्य को कम समय मिल पाता है। इसी वजह से नाम को ‘बंगाल’ या ‘बांग्ला’ करने का विचार सामने आया। लेकिन केंद्र की मंजूरी नहीं मिलने के कारण यह प्रयास भी सफल नहीं हो सका।
2016 में क्या हुआ था? क्यों फिर अटक गया मामला?
नाम बदलने की कवायद 2016 में एक बार फिर तेज हुई। ममता बनर्जी सरकार ने अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम रखने का प्रस्ताव आगे बढ़ाया। बाद में ‘बांग्ला’ नाम को लेकर विधानसभा से प्रस्ताव पारित किया गया। लेकिन विधानसभा से प्रस्ताव पारित होना अंतिम मंजूरी नहीं थी। केंद्र सरकार की ओर से इसे आगे बढ़ाने में संवैधानिक और प्रक्रियागत अड़चनें सामने आईं। भाजपा नेताओं ने उस समय ‘बांग्ला’ नाम को लेकर ऐतिहासिक और राजनीतिक आपत्तियां भी उठाई थीं। नतीजा यह हुआ कि तीसरी बड़ी कोशिश भी मंजिल तक नहीं पहुंच सकी।
तो क्या इस बार हालात अलग हैं?
यही इस पूरी कहानी का सबसे अहम सवाल है। पहले की कोशिशों में राज्य और केंद्र में अलग-अलग राजनीतिक दलों की सरकारें होने के कारण प्रस्तावों को आगे बढ़ाने में राजनीतिक और प्रशासनिक टकराव सामने आया था। अब स्थिति बदली हुई है। भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार राज्य में सत्ता में है और केंद्र में भी भाजपा की ही सरकार है। इसी वजह से राजनीतिक स्तर पर यह उम्मीद जताई जा रही है कि इस बार प्रस्ताव के केंद्र तक पहुंचने और आगे बढ़ने की संभावना पहले के मुकाबले ज्यादा हो सकती है। लेकिन इसे अभी निश्चित फैसला मानना जल्दबाजी होगी। विधानसभा में विधेयक आने, उसकी प्रक्रिया पूरी होने और केंद्र तथा संसद की मंजूरी के बाद ही नाम परिवर्तन संभव होगा।
क्या सिर्फ विधानसभा में बिल पास होते ही बदल जाएगा नाम?
नहीं। राज्य का नाम बदलने के लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है। विधानसभा में प्रस्ताव या विधेयक पारित होना इस प्रक्रिया का केवल एक हिस्सा है। संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्य की सीमा या नाम में बदलाव से संबंधित विधेयक संसद में पेश किया जाता है और इसके लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होती है।
सामान्य तौर पर प्रक्रिया को इस तरह समझा जा सकता है:
- राज्य सरकार नाम परिवर्तन का प्रस्ताव विधानसभा में लाती है।
- विधानसभा में प्रस्ताव/विधेयक पर चर्चा और कार्रवाई होती है।
- संवैधानिक प्रक्रिया के तहत मामला राष्ट्रपति की सिफारिश और राज्य विधानसभा की राय से जुड़ता है।
- इसके बाद संसद में विधेयक पेश किया जाता है।
- लोकसभा और राज्यसभा से विधेयक पारित होना जरूरी होता है।
- संसद से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है।
- राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही नाम परिवर्तन कानून का रूप लेता है।
इसलिए विधानसभा में बिल पेश होना शुरुआत होगी, अंत नहीं।
क्या ‘बांग्ला’ नाम का अध्याय पूरी तरह खत्म हो गया?
फिलहाल भाजपा की ओर से दिए गए संकेतों से यही लगता है कि सरकार की प्राथमिकता ‘पश्चिम बंग’ नाम रखने की है। यह प्रस्ताव पिछली सरकार के ‘बांग्ला’ नाम वाले प्रस्ताव से बिल्कुल अलग राजनीतिक और ऐतिहासिक तर्क पर आधारित है। एक तरफ ‘बांग्ला’ को बंगाली भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा गया था, वहीं ‘पश्चिम बंग’ प्रस्ताव के पीछे विभाजन के बाद बने पश्चिमी हिस्से की ऐतिहासिक पहचान को प्रमुखता देने की बात कही जा रही है। यही अंतर आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति में नई बहस को जन्म दे सकता है।
वाराणसी में भी बनेगा ‘पश्चिम बंग भवन’?
नाम बदलने के ऐलान के साथ ही शमिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में प्रस्तावित ‘पश्चिम बंग भवन’ की योजना का भी जिक्र किया। बताया गया है कि इस भवन को बंगाल से वाराणसी जाने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए उपयोगी बनाने की योजना है। प्रस्तावित परिसर में ठहरने की सुविधा के साथ सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए स्थान, सम्मेलन कक्ष और पुस्तकालय जैसी सुविधाओं का विचार भी सामने आया है। इस परियोजना को वाराणसी और बंगाल के पुराने आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या 27 साल बाद बदलेगा पश्चिम बंगाल का नाम?
यही अब सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है। 1999 में शुरुआत, उसके बाद ममता बनर्जी सरकार की कोशिशें और 2016-18 में ‘बांग्ला’ नाम का प्रस्ताव—तीन दौर में मामला आगे बढ़ा, लेकिन हर बार अंतिम मंजूरी की दहलीज पर अटक गया। अब भाजपा सरकार ‘बांग्ला’ के बजाय ‘पश्चिम बंग’ नाम लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में है। अगर विधानसभा में विधेयक पेश होता है और उसे राज्य में राजनीतिक समर्थन मिलता है, तो अगली चुनौती होगी केंद्र, संसद और राष्ट्रपति की संवैधानिक प्रक्रिया। यानी इस बार सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि “क्या पश्चिम बंगाल का नाम बदलेगा?” असल सवाल है—क्या सुवेंदु अधिकारी सरकार 27 साल पुरानी इस अधूरी कहानी को इस बार उसके अंतिम पड़ाव तक पहुंचा पाएगी? फिलहाल जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना साफ है कि ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव आने वाले विधानसभा सत्र में बंगाल की राजनीति की सबसे बड़ी बहसों में से एक बनने जा रहा है।