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‘द वन’ रिव्यू : सिद्धार्थ-तमन्ना की फिल्म में लोककथा, हॉरर और रोमांच का जबरदस्त संगम, कई सीन बांधकर रखते हैं

सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द वन’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म की कहानी बिहार की लोककथाओं, रहस्यमयी जंगल, वन देवी की मान्यताओं और छठ पूजा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को आधुनिक हॉरर और एडवेंचर के. . .

डेस्क। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द वन’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म की कहानी बिहार की लोककथाओं, रहस्यमयी जंगल, वन देवी की मान्यताओं और छठ पूजा की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को आधुनिक हॉरर और एडवेंचर के साथ जोड़ती है। नतीजा ऐसी कहानी के रूप में सामने आता है, जिसमें रहस्य धीरे-धीरे खुलता है और कई मौकों पर फिल्म दर्शकों को स्क्रीन से नजर हटाने का मौका नहीं देती।

जमीन के झगड़े से शुरू होती है रहस्यमयी कहानी

फिल्म की कहानी ऋषि यानी सिद्धार्थ मल्होत्रा के इर्द-गिर्द घूमती है। मुंबई में रहने वाला ऋषि अपनी पत्नी ममता यानी तमन्ना भाटिया के साथ अपने पुश्तैनी गांव देवांचल पहुंचता है। शुरुआत में उसकी गांव वापसी जमीन से जुड़े एक मामले की वजह से होती है। लेकिन गांव पहुंचने के बाद हालात तेजी से बदलने लगते हैं। जिस विवाद को ऋषि एक सामान्य पारिवारिक और संपत्ति से जुड़ा मामला समझकर आया था, उसके पीछे एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया छिपी है, जिसकी उसे कल्पना तक नहीं थी। गांव के पास मौजूद जंगल को स्थानीय लोग वन देवी का पवित्र क्षेत्र मानते हैं। मान्यता है कि सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना खतरे से खाली नहीं है। ऋषि जब रात में इस निषिद्ध जंगल में कदम रखता है, तो उसके सामने एक के बाद एक ऐसे रहस्य खुलने लगते हैं, जो उसकी पूरी सोच बदल देते हैं।

फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है इसकी लोककथा

‘द वन’ की कहानी को खास बनाता है इसका लोककथा वाला पहलू। फिल्म शुरुआत में ही सारे रहस्य खोल देने के बजाय धीरे-धीरे अपनी दुनिया तैयार करती है। पहले गांव की मान्यताएं सामने आती हैं, फिर वन देवी से जुड़ी कहानियां और उसके बाद कहानी उस अलौकिक शक्ति की ओर बढ़ती है, जिसका जंगल से गहरा संबंध है। यही धीरे-धीरे बढ़ता रहस्य फिल्म में रोमांच बनाए रखता है। दर्शक लगातार यह जानने की कोशिश करता रहता है कि आखिर जंगल में ऐसा क्या है और ऋषि के साथ जो कुछ हो रहा है, उसके पीछे की असली वजह क्या है।

सिद्धार्थ मल्होत्रा ने निभाया बिल्कुल अलग किरदार

सिद्धार्थ मल्होत्रा इस फिल्म में अपने पिछले किरदारों से काफी अलग अंदाज में नजर आते हैं। उनका किरदार एक तरफ भाव गंभीरता, डर, गुस्से और भावनात्मक संघर्ष को अच्छी तरह संभाला है। फिल्म केनात्मक है तो दूसरी तरफ जरूरत पड़ने पर एक्शन से भरपूर भी हो जाता है। सिद्धार्थ ने किरदार की गंभीरता, डर, गुस्से और भावनात्मक संघर्ष को अच्छी तरह संभाला है। फिल्म के एक्शन और थ्रिल वाले हिस्सों में भी उनकी मौजूदगी असर छोड़ती है। खास बात यह है कि उनका किरदार केवल एक्शन हीरो के तौर पर नहीं दिखाया गया है। कहानी आगे बढ़ने के साथ उसके भीतर का डर और असमंजस भी सामने आता है।

तमन्ना के साथ सिद्धार्थ की केमिस्ट्री

तमन्ना भाटिया ने ममता के किरदार में कहानी को भावनात्मक आधार दिया है। सिद्धार्थ और तमन्ना की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री फिल्म के गंभीर और रहस्यमयी माहौल के बीच रोमांस का एक अलग रंग जोड़ती है। दोनों के बीच के सीन कहानी को सिर्फ हॉरर और थ्रिल तक सीमित नहीं रहने देते। खासकर कहानी के भावनात्मक हिस्सों में तमन्ना का प्रदर्शन असरदार नजर आता है।

सुनील ग्रोवर का अंदाज करेगा हैरान

फिल्म में सुनील ग्रोवर का किरदार सबसे अलग और चौंकाने वाले हिस्सों में से एक है। जिस अंदाज में उन्हें पर्दे पर पेश किया गया है, वह उनके अब तक देखे गए किरदारों से काफी अलग महसूस होता है। वहीं मनीष पॉल अपनी कॉमिक टाइमिंग से फिल्म के तनावपूर्ण माहौल में हल्के-फुल्के पल लेकर आते हैं। सिद्धार्थ के साथ उनकी जुगलबंदी कुछ दृश्यों में खूब हंसाती है। श्वेता तिवारी और अनुप सोनी भी अपनी भूमिकाओं के जरिए फिल्म की लोककथा वाली दुनिया को मजबूत करते हैं।

संगीत में रोमांस से लेकर भक्ति तक

फिल्म का संगीत कहानी के अलग-अलग मूड के साथ तालमेल बैठाता है। ‘समझो ना’ रोमांटिक माहौल बनाता है, जबकि ‘छठी मईया’ फिल्म की सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को मजबूती देता है। वहीं ‘थुम्मक थुम्मक’ कहानी में ऊर्जा और मनोरंजन का रंग भरता है। छठ पूजा और बिहार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का इस्तेमाल फिल्म को एक अलग पहचान देता है। यह पहलू कहानी को सिर्फ एक सामान्य हॉरर फिल्म बनने से रोकता है।

VFX शानदार बनने से थोड़ा रह गया पीछे

फिल्म का कैनवास बड़ा है। रहस्यमयी जंगल, भव्य सेट और अलौकिक दुनिया को बड़े स्तर पर दिखाने की कोशिश की गई है। हालांकि कुछ जगहों पर VFX फिल्म की कमजोर कड़ी नजर आता है। कुछ विजुअल्स और एनिमेशन अगर ज्यादा प्रभावशाली होते तो फिल्म का सिनेमाई अनुभव और बेहतर हो सकता था। इसके बावजूद फिल्म की कहानी, बैकग्राउंड म्यूजिक और कलाकारों के प्रदर्शन की वजह से ये कमियां बहुत देर तक परेशान नहीं करतीं।

स्क्रीनप्ले में थोड़ी और कसावट की जरूरत

फिल्म का कॉन्सेप्ट दिलचस्प है, लेकिन स्क्रीनप्ले हर जगह उतनी ही तेजी से नहीं चलता। फिल्म में हॉरर, रोमांस, एक्शन, लोककथा, रहस्य और सुपरनैचुरल एलिमेंट्स को एक साथ पिरोने की कोशिश की गई है। इसी वजह से कुछ हिस्सों में कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस होती है। कुछ दृश्यों को छोटा किया जाता और स्क्रीनप्ले थोड़ा और कसा हुआ होता तो फिल्म का प्रभाव और मजबूत हो सकता था। हालांकि, फिल्म का मूल विचार इतना अलग है कि ये कमजोरियां इसकी पूरी चमक को फीका नहीं करतीं।

भारतीय लोककथा का नया अंदाज

‘द वन’ की सबसे खास बात यही है कि यह भारतीय लोककथाओं को आधुनिक हॉरर और एडवेंचर के साथ जोड़ने की कोशिश करती है। बिहार की संस्कृति, गांव की मान्यताएं, जंगल और वन देवी की कहानी फिल्म को एक अलग वातावरण देते हैं। फिल्म में पुराने समय की लोककथा वाली फील भी है, जो कहीं-कहीं अमर चित्रकथा और चंपक जैसी बचपन की कहानियों की याद दिलाती है, लेकिन उसे आधुनिक सिनेमाई अंदाज में पेश किया गया है।

कैसी है ‘द वन’?

अगर आप ऐसी फिल्में पसंद करते हैं जिनमें रहस्य, हॉरर, रोमांच, लोककथा और थोड़ा रोमांस एक साथ देखने को मिले, तो ‘द वन’ आपके लिए दिलचस्प अनुभव हो सकती है। फिल्म की कहानी में नयापन है, माहौल आकर्षक है और कलाकारों ने अपने किरदारों को अच्छी तरह संभाला है। सिद्धार्थ मल्होत्रा का अलग अंदाज, तमन्ना भाटिया की भावनात्मक मौजूदगी और सुनील ग्रोवर का चौंकाने वाला किरदार फिल्म को अतिरिक्त आकर्षण देते हैं। बस फिल्म देखते समय हर अलौकिक घटना का लॉजिक खोजने बैठेंगे तो कुछ सवाल जरूर परेशान कर सकते हैं। अगर आप इसे एक लोककथा से प्रेरित हॉरर-एडवेंचर की तरह देखते हैं, तो फिल्म का मजा कहीं ज्यादा आएगा।

फिल्म को थिएटर में देखने लायक

कुल मिलाकर: ‘द वन’ परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन इसकी कहानी और सेटिंग इसे आम हॉरर फिल्मों से अलग खड़ा करती है। रहस्य खुलने का इंतजार, जंगल का डर और सिद्धार्थ-तमन्ना की केमिस्ट्री—ये तीन चीजें फिल्म को थिएटर में देखने लायक बनाती हैं।

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