Home » एक्सक्लूसिव » खंभों पर भगवान गणेश की आकृति, दीवारों पर ॐ नमः शिवाय, भोजशाला में मंदिर होने के एक नहीं मिले कई प्रमाण, ये है ASI रिपोर्ट की इनसाइड स्टोरी

खंभों पर भगवान गणेश की आकृति, दीवारों पर ॐ नमः शिवाय, भोजशाला में मंदिर होने के एक नहीं मिले कई प्रमाण, ये है ASI रिपोर्ट की इनसाइड स्टोरी

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर शुक्रवार को हाईकोर्ट के फैसले के बाद विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू. . .

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर शुक्रवार को हाईकोर्ट के फैसले के बाद विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। कोर्ट ने हिंदू पक्ष की याचिका पर सुनवाई करते हुए भोजशाला परिसर को हिंदू मंदिर बताया। फैसले के अगले ही दिन आज तक की टीम भोजशाला परिसर के अंदर पहुंची, जहां कैमरे में कई ऐसे चिन्ह और आकृतियां कैद हुईं, जिन्हें हिंदू पक्ष लंबे समय से अपने दावों का आधार बताता रहा है। आज तक के कैमरे में भोजशाला परिसर के अंदर मौजूद प्राचीन खंभों और दीवारों पर कई सनातन प्रतीक साफ तौर पर दिखाई दिए। भोजशाला में कुल 104 प्राचीन खंभे मौजूद हैं, जिन पर अलग-अलग धार्मिक आकृतियां उकेरी गई हैं। इनमें भगवान गणेश की आकृति, घंटियां, रिद्धि-सिद्धि के प्रतीक और अन्य पारंपरिक हिंदू चिन्ह शामिल हैं। कई खंभों पर बनी नक्काशी मंदिर वास्तुकला की शैली से मेल खाती नजर आई।

भोजशाला परिसर अब मंदिर माना जाएगा

मध्य प्रदेश के धार में स्थित भोजशाला परिसर अब मंदिर माना जाएगा। इसको लेकर चल रहे विवाद पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को विराम लगा दिया। अदालत ने कहा कि पुरातात्विक व्याख्या कोई अनुमान का विषय नहीं बल्कि एक बहु-विषयी वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि यह फैसला अपने आप में अलग-थलग नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले में फैसले में स्थापित किए गए सिद्धांतों पर आधारित है। तो आइए जानते हैं उन नौ बड़े वैज्ञानिक आधारों के बारे में जिनसे कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर माना।

परमारकालीन मंदिर की नींव मिली, मौजूदा ढांचा बाद का

एएसआई की हाई कोर्ट में वैज्ञानिक सर्वे के बाद 2189 पेज की रिपोर्ट पेश की थी। इसमें बताया कि मौजूदा ढांचे के नीचे 10वीं-11वीं शताब्दी के परमारकालीन निर्माण के प्रमाण मिले। खुदाई में विशाल बेसाल्ट पत्थरों, प्राचीन ईंटों व मंदिर शैली की नींव का पता चला।

‘शारदा सदन’ लिखे शिलालेख मिले

एएसआई को मिले कई संस्कृत शिलालेखों में इस स्थल को ‘शारदा सदन’ कहा गया। शारदा को देवी सरस्वती का रूप माना जाता है। किसी धार्मिक-शैक्षणिक केंद्र के लिए इस प्रकार का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पारिजात मंजरी के मंचन का उल्लेख

साहित्यिक ग्रंथ ‘पारिजात मंजरी’ का शिलालेख परिसर में मिला। प्रस्तावना में दर्ज है कि इस नाटक का पहला मंचन इसी सरस्वती मंदिर में हुआ था। एएसआई ने इसे अहम सांस्कृतिक प्रमाण माना क्योंकि इससे यह साबित होता है कि परिसर साहित्य, नाट्य और विद्या गतिविधियों का भी बड़ा केंद्र था।

106 स्तंभ मंदिर स्थापत्य शैली के पाए गए

परिसर के 106 स्तंभ और 82 पिलास्टर पर हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़ी नक्काशी, देवी-देवताओं की आकृतियां और पारंपरिक स्थापत्य पैटर्न हैं। जांच में कहा गया कि इन्हें मूल मंदिर से निकालकर बाद के निर्माण में दोबारा लगाया गया। कई स्तंभों की दिशा और आधार भी असंगत पाए गए।

शिलालेखों को घिसा गया, पत्थर उल्टे लगे

रिपोर्ट में कहा गया कि संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों को जानबूझकर घिसा गया। कई पत्थरों को दीवारों व फर्श में उल्टा-तिरछा लगाया गया, ताकि उन पर लिखी सामग्री पढ़ी न जा सके। कई स्तंभों की ऊंचाई, दिशा और नक्काशी भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाती। एएसआई के अनुसार, पुराने मंदिर के अवशेषों पत्थरों, स्तंभों और शिलालेखों का व्यापक पुनः उपयोग कर मौजूदा ढांचा तैयार किया गया। कई पत्थरों को मूल क्रम व दिशा की परवाह किए बिना लगाया।

देवी-देवताओं की आकृतियां छेनी-हथौड़े से काटी गईं

कई पत्थरों और स्तंभों पर बनी मूर्तियों व धार्मिक आकृतियों को जानबूझकर क्षतिग्रस्त किया गया। कई चेहरे, हाथ व प्रतीक छेनी-हथौड़े से काटे गए मिले। रिपोर्ट में इसे मंदिर की मूल पहचान मिटाने की कोशिश के रूप में देखा गया।

संस्कृत-प्राकृत शिलालेख अरबी-फारसी से अधिक प्राचीन मिले

एएसआई को परिसर से 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले, जबकि अरबी और फारसी के लगभग 56 शिलालेख मिले। संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अधिक पुराने और मूल संरचना से जुड़े हैं।

कारीगरों के ‘सिग्नेचर मार्क’ मिले

खंभों और दीवारों पर दर्जनों प्रतीक मिले। इनमें 139 चक्र चिह्न, 79 त्रिशूल, कई स्वास्तिक और अन्य प्रतीक शामिल हैं। एएसआई ने इन्हें तत्कालीन कारीगरों के निर्माण चिह्न या कोड बताया।

गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और भैरव की मूर्तियां

एएसआई को परिसर से 94 मूर्तियां और कलाकृतियां मिलीं। इनमें गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह, भैरव और चार भुजाओं वाले देवी-देवताओं की मूर्तियां शामिल थीं। कई मूर्तियों में कीर्तिमुख, व्याल और मंदिर कला से जुड़े विशिष्ट प्रतीक भी मिले। दीवारों पर लाल गेरू से बने कई हाथों के निशान पाए गए। इनमें कुछ निशान इतने छोटे थे कि वे किसी बच्चे के हाथ जैसे प्रतीत हुए। रिपोर्ट में में इसे धार्मिक या सांस्कृतिक अनुष्ठानों से जोड़ा गया।

मार्च 2024 में हाई कोर्ट ने मांगी थी ASI रिपोर्ट

ASI से जुड़े पूरे मामले पर प्रकाश डालें तो भोजशाला काे लेकर मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में गया था। जिस पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मार्च 2024 में एएसआई से इस बारे में रिपोर्ट देने काे कहा।

डाॅ. आलोक त्रिपाठी की अगुआई में शुरू हुआ सर्वे

एएसआई की ओर से यह जिम्मेदारी एएसआई के उस समय के अतिरिक्त महानिदेशक डाॅ. आलोक त्रिपाठी काे सौंपी गई। डाॅ. त्रिपाठी ने मार्च 2024 में ही 50 पुरातत्वविदों, भाषा विज्ञानियों आदि के साथ भोजशाला का सर्वे शुरू किया।

सर्वे और खुदाई में मिले अभिलेख व मंदिर अवशेष

वहां वर्तमान स्मारक का गहनता से सर्वे हुआ, उत्खनन कार्य हुआ और स्मारक में सफाई की गई। इस दौरान वर्तमान स्मारक पर लगे दो अभिलेख मिले, जिन पर प्राकृत और संस्कृत भाषा की लिखावट मिली।

सफाई और खुदाई में मिलीं टूटी मूर्तियां

वहां की सफाई, खाेदाई में टूटी हुईं मूर्तियां, मंदिर के अवशेष, अभिलेखों के अवशेष प्राप्त हुए। उन पर भी प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखावट प्राप्त हुई।

पारिजात मंजरी और अवनी कूर्म शतम का मिला उल्लेख

जो दो अभिलेख माैजूद हैं वे एक ग्रंथ के रूप में हैं, जिनका नाम पारिजात मंजरी और अवनी कूर्म शतम हैं। दोनों ही संस्कृत साहित्य की प्रसिद्ध कृतियां हैं, जो मुख्य रूप से परमार वंश के राजा भोजदेव और वंशजाें से संबंधित मानी जाती हैं।

अवनी कूर्म शतम को लेकर विद्वानों की अलग राय

यद्यपि अवनी कूर्म शतम की रचना को देखते हुए कुछ विद्वान इसे स्वयं भोजराज की रचना न मानकर उनके आश्रित कवि की रचना मानते हैं, लेकिन इसकी अंतिम गाथा में इसे भोजराज द्वारा रचित ही माना गया है। पारिजात मंजरी भी राजा भोज के वंश से संबंधित मानी जाती है।

जुलाई 2024 में हाई कोर्ट को सौंपी गई 2190 पेज की रिपोर्ट


मार्च 2024 से शुरू हुई खोदाई और सर्वे का काम जुलाई 2024 तक चला। वहां का सर्वे कर 2190 पेज की रिपोर्ट जुलाई 2024 में तैयार कर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट को सौंपी गई। जिसमें वर्तमान स्मारक के नीचे दबे 11वीं 12वीं और 13वीं शताब्दी के साक्ष्य मिले।

हिंदू मंदिर और अध्ययन केंद्र होने के मिले प्रमाण

यहां हिंदू मंदिर के साथ साथ अध्ययन केंद्र होने के भी प्रमाण मिले हैं। वहां स्मारक की दीवारों पर मंदिर के अवशेष, खंडित मूर्तियां लगी मिली हैं। इससे पता चलता है कि वहां का वर्तमान निर्माण से पहले भी कोई हिन्दू निर्माण था, जिसे तोड़कर उसके अवशेष वर्तमान निर्माण में उपयोग किए गए।

Web Stories
 
इन लोगों को नहीं खाना चाहिए मोरिंगा शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए खाएं ये वेजेटेरियन फूड्स हल्दी का पानी पीने से दूर रहती हैं ये परेशानियां सकट चौथ व्रत पर भूल से भी न करें ये गलतियां बुध के गोचर से इन राशियों का शुरू होगा गोल्डन टाइम