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23 साल बाद फिर उठा पितृत्व का सवाल ! 2003 के कथित दुष्कर्म मामले में महिला ने मांगी DNA जांच, पूर्व मंत्री पर लगाए गंभीर आरोप

उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 साल पुराने एक मामले ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। अपने बेटे के जैविक पिता की पहचान जानने के लिए एक महिला ने दोबारा न्याय की गुहार लगाई है।. . .

देहरादून : उत्तराखंड की राजनीति में करीब 23 साल पुराने एक मामले ने एक बार फिर हलचल मचा दी है। अपने बेटे के जैविक पिता की पहचान जानने के लिए एक महिला ने दोबारा न्याय की गुहार लगाई है। महिला का आरोप है कि वर्ष 2003 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के एक मंत्री ने उनके साथ दुष्कर्म किया था। अब वह अपने 23 वर्षीय बेटे का पितृत्व कानूनी रूप से साबित कराने के लिए DNA टेस्ट और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से नए सिरे से जांच कराने की मांग कर रही हैं। इस सिलसिले में महिला ने उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक (DGP) दीपम सेठ से मुलाकात कर नई शिकायत दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इतने वर्षों बाद भी उन्हें न्याय नहीं मिला है और अब वह अपने बेटे को उसके पिता का नाम दिलाना चाहती हैं।

DGP से मिलकर लगाई न्याय की गुहार, DNA टेस्ट की मांग

महिला ने शनिवार को पत्रकारों से बातचीत में कहा कि वह अपने बेटे के भविष्य और पहचान के लिए उत्तराखंड लौटी हैं। उन्होंने प्रशासन से मामले की निष्पक्ष जांच कराने और DNA परीक्षण के जरिए बेटे के पितृत्व का कानूनी निर्धारण करने की मांग की है। महिला के मुताबिक, उन्हें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर भरोसा है। इसी विश्वास के साथ वह दोबारा देहरादून आई हैं। उन्होंने कहा कि फिलहाल वह असम लौट जाएंगी, लेकिन जब तक उनके बेटे को न्याय नहीं मिलता, तब तक उत्तराखंड आती रहेंगी। महिला ने यह भी आशंका जताई कि उत्तराखंड में रहने के दौरान उनकी जान को खतरा हो सकता है।

16 साल की उम्र में दुष्कर्म का आरोप, मानसिक अस्पताल में भर्ती कराने का भी दावा

महिला ने वर्ष 2003 की घटना का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि उस समय उनकी उम्र महज 16 साल थी। उनका दावा है कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार के एक कैबिनेट मंत्री ने उनके साथ दुष्कर्म किया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि घटना के बाद उन्हें मानसिक अस्पताल में भर्ती करा दिया गया था। महिला के अनुसार, गर्भवती होने के दौरान भी उनके साथ कथित तौर पर मारपीट और प्रताड़ना की गई। उन्होंने दावा किया कि वह लगभग डेढ़ महीने तक संबंधित मंत्री के साथ रहीं और इस दौरान उन्हें अलग-अलग होटलों में ले जाया जाता था। महिला का कहना है कि उस समय उन्हें सख्त हिदायत दी गई थी कि वह दोबारा कभी उत्तराखंड में कदम न रखें।

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2016 में दर्ज कराया था मामला, CBI जांच पर भी उठाए सवाल

महिला ने बताया कि वर्ष 2016 में उन्होंने संबंधित नेता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद मामले की जांच CBI को सौंपे जाने का आदेश दिया गया था। हालांकि, महिला का आरोप है कि जांच के नाम पर उनसे केवल एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराए गए। इसके बाद किसी भी CBI अधिकारी ने उनसे संपर्क नहीं किया और न ही उनका पक्ष ठीक से सुना गया। अब वह चाहती हैं कि मामले की दोबारा जांच हो और उनके बेटे का DNA परीक्षण कराकर पितृत्व से जुड़े सवाल का कानूनी समाधान निकाला जाए।

चुनाव से पहले राजनीतिक विवाद में नाम घसीटने पर दी कानूनी कार्रवाई की चेतावनी

आगामी विधानसभा चुनाव से पहले इस पुराने मामले के फिर चर्चा में आने को लेकर भी महिला से सवाल पूछे गए। इस पर उन्होंने स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक दल या नेता के पक्ष में नहीं हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ अपने बेटे को न्याय दिलाना है। महिला ने कहा कि उनके नाम का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए नहीं किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति इस मामले को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करता है, तो वह उसके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगी।

आरोपी नेता ने आरोपों को बताया गलत, अदालत से बरी होने का किया दावा

दूसरी ओर, महिला द्वारा लगाए गए आरोपों को संबंधित पूर्व मंत्री ने खारिज किया है। उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना पक्ष रखा और दावा किया कि इस मामले में अदालत उन्हें पहले ही बरी कर चुकी है। उनका यह भी कहना है कि CBI ने उन्हें निर्दोष पाया था। नेता के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2007 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत के कार्यकाल के दौरान लैंसडाउन की एक जनसभा में भी इस मामले का जिक्र किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि वह दोषी होते तो भारतीय जनता पार्टी उन्हें पार्टी में क्यों शामिल करती और मंत्री पद कैसे देती? उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित घटना के बाद जनता ने उन्हें तीन बार चुनाव में जीत दिलाई है।

कांग्रेस से BJP और फिर कांग्रेस में लौटे नेता

इस मामले में आरोपों के घेरे में आए नेता उत्तराखंड की राजनीति के वरिष्ठ चेहरों में शामिल रहे हैं। वह तत्कालीन कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। वर्ष 2016 में उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था। बाद में वह फिर कांग्रेस में लौट आए। फिलहाल इस मामले में महिला की नई शिकायत, DNA जांच की मांग और पूर्व मंत्री के इनकार के बाद राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। हालांकि, महिला द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और नए सिरे से जांच का परिणाम सामने आना अभी बाकी है। फिलहाल इस पूरे मामले का सबसे अहम सवाल यही है कि क्या 23 साल बाद DNA परीक्षण के जरिए महिला के बेटे के पितृत्व से जुड़ी सच्चाई कानूनी रूप से सामने आ पाएगी?

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