नई दिल्ली: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के जरिए होने वाले बड़े मर्चेंट लेन-देन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने से जुड़े केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने 14 और 15 सितंबर 2026 को वित्त मंत्रालय की ओर से जारी राजपत्रित अधिसूचनाओं के अमल पर तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना शामिल हैं, ने केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और UPI एवं सर्विसेज स्टीयरिंग कमेटी को नोटिस जारी किया है। अदालत ने संबंधित पक्षों से इस व्यवस्था के कानूनी आधार और सरकार के अधिकार क्षेत्र को लेकर जवाब मांगा है। मामला अंजन दत्ता बनाम भारत संघ से संबंधित है।
सुनवाई में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ₹2,000 से अधिक के व्यावसायिक UPI लेन-देन पर MDR लगाने से कारोबारियों पर अतिरिक्त लागत बढ़ सकती है। याचिकाकर्ता ने आशंका जताई कि इसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है और इससे नकदी आधारित लेन-देन को बढ़ावा मिलने की संभावना है।
केंद्र की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन. वेंकटरमन ने अदालत को बताया कि नया शुल्क ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से प्रभावी होगा। सरकार का कहना है कि यह कोई टैक्स या सरकारी शुल्क नहीं है और इससे प्राप्त राशि सरकारी खाते में नहीं जाएगी।सरकार के मुताबिक, MDR भुगतान एग्रीगेटर्स और बैंकों के बीच होने वाला सेटलमेंट शुल्क है, जिसका उद्देश्य डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे और पूरे पेमेंट इकोसिस्टम की लागत को पूरा करना है।सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने आयकर अधिनियम की धारा 269SU का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जब कानून डिजिटल भुगतान की अनुमति देता है, तो प्रस्तावित शुल्क के लिए कानूनी बाध्यता का आधार क्या है और इसमें सरकार के कार्यकारी अधिकार की सीमा क्या है। अदालत ने केंद्र सरकार को हलफनामे के जरिए इन सवालों पर विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया है।
किन UPI लेन-देन पर MDR लगेगा?
सरकार की ओर से जारी व्यवस्था के अनुसार, आम उपभोक्ताओं और छोटे कारोबारियों के अधिकांश लेन-देन पर MDR का असर नहीं पड़ेगा। सरकार के मुताबिक, करीब 96 फीसदी मर्चेंट लेन-देन इस बदलाव से प्रभावित नहीं होंगे।
- ₹2,000 तक के P2M लेन-देन: इन पर MDR शून्य रहेगा।
- छोटे व्यापारी: QR कोड के जरिए प्रति माह ₹1 लाख तक प्राप्त करने वाले छोटे कारोबारियों को MDR से छूट दी गई है।
- ₹2,000 से अधिक के सामान्य मर्चेंट लेन-देन: इन पर 0.4 फीसदी का मानक MDR प्रस्तावित है।
- ₹75,000 या उससे अधिक के लेन-देन: MDR की अधिकतम सीमा ₹300 होगी।
जरूरी सेवाओं और कैपिटल मार्केट के लिए अलग दरें
कुछ आवश्यक सेवाओं के लिए अलग शुल्क व्यवस्था रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा, ईंधन और कृषि इनपुट जैसे क्षेत्रों में ₹2,000 से अधिक के लेन-देन पर अधिकतम ₹5 का फ्लैट शुल्क लागू होगा। वहीं, कैपिटल मार्केट से जुड़े लेन-देन के लिए MDR की दर 0.02 फीसदी रखी गई है, जिसकी अधिकतम सीमा ₹300 होगी।
उपभोक्ताओं पर शुल्क डालने की अनुमति नहीं
सरकार ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A में संशोधन के जरिए शुल्क व्यवस्था का प्रावधान किया है। इसके साथ बैंकों और UPI ऐप प्रदाताओं को निर्देश दिए गए हैं कि MDR का बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर न डाला जाए। इसके अलावा UPI ऐप प्रदाताओं द्वारा किसी तरह का छिपा हुआ प्लेटफॉर्म शुल्क लगाए जाने पर भी रोक का प्रावधान है।
15 अक्टूबर से लागू होगा नया ढांचा
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तत्काल अंतरिम रोक लगाने से इनकार के बाद फिलहाल नया MDR ढांचा 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने का रास्ता साफ है। हालांकि, इसकी कानूनी वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
अब मामले में केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब पर नजर रहेगी। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष होने वाली आगे की सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि बड़े UPI मर्चेंट लेन-देन पर MDR लगाने की व्यवस्था कानूनी रूप से किस आधार पर