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सिक्किम टनल हादसा : सुरंग हादसों से सबक क्यों नहीं लिया जाता? हर बड़े हादसे के बाद उठते हैं वही सवाल, पहले भी हो चुके हैं बड़े सुरंग हादसे

गंगटोक। सिक्किम टनल हादसे ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे बड़े निर्माण कार्यों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बड़े सुरंग हादसे के बाद जांच, रिपोर्ट और सुधार के दावे किए जाते हैं,. . .

गंगटोक। सिक्किम टनल हादसे ने एक बार फिर पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे बड़े निर्माण कार्यों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बड़े सुरंग हादसे के बाद जांच, रिपोर्ट और सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर ऐसी ही घटनाएं सामने आ जाती हैं। सवाल यह है कि आखिर बार-बार होने वाले हादसों से स्थायी सबक क्यों नहीं लिया जाता?

पहले भी हो चुके हैं बड़े सुरंग हादसे, फिर भी नहीं बदली तस्वीर

देश में इससे पहले भी कई बड़े सुरंग हादसे हो चुके हैं। उत्तराखंड के सिलक्यारा-बारकोट टनल हादसे से लेकर हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना की घटनाओं तक, हर बार सुरक्षा मानकों, भूगर्भीय जांच और निर्माण प्रक्रिया पर सवाल उठे। बावजूद इसके, पहाड़ी इलाकों में सुरंग निर्माण के दौरान जोखिम लगातार बना हुआ है।

हिमालयी इलाकों में सुरंग निर्माण कितना सुरक्षित?

हिमालयी क्षेत्र अपनी कमजोर भूगर्भीय संरचना के कारण बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। यहां चट्टानों की स्थिति, पानी का दबाव, भूस्खलन और गैस रिसाव जैसी चुनौतियां हमेशा बनी रहती हैं। ऐसे में सुरंग निर्माण के लिए अत्याधुनिक तकनीक और सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल की जरूरत होती है।

सिर्फ प्राकृतिक आपदा या मानवीय चूक?

सुरंग हादसों को अक्सर भूस्खलन या प्राकृतिक कारणों से जोड़ दिया जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कमजोर सर्वेक्षण, सुरक्षा उपायों की कमी और निर्माण में जल्दबाजी जैसे मानवीय कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।

रिपोर्ट बनती है, जांच होती है, लेकिन बदलाव कितना आता है?

हर हादसे के बाद विशेषज्ञ समितियां गठित की जाती हैं और सुरक्षा सुधारों की बात होती है। लेकिन सवाल यह है कि इन रिपोर्टों की सिफारिशों को जमीन पर कितना लागू किया जाता है।

मीथेन गैस से लेकर कमजोर चट्टानों तक, टनल निर्माण की छिपी चुनौतियां

सिक्किम हादसे में मीथेन गैस की आशंका ने बचाव अभियान को और मुश्किल बना दिया। इससे यह सवाल फिर सामने आया है कि क्या निर्माण से पहले जमीन के अंदर मौजूद संभावित खतरों का पर्याप्त आकलन किया गया था?

विकास की रफ्तार बनाम सुरक्षा: पहाड़ों में बड़े प्रोजेक्ट्स की चुनौती

सड़क, रेलवे और हाइड्रो पावर परियोजनाएं देश के विकास के लिए जरूरी हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में इन परियोजनाओं के साथ पर्यावरण और सुरक्षा का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

सिलक्यारा से सिक्किम तक: क्यों बार-बार दोहराई जा रही है वही कहानी?

पिछले कुछ वर्षों में हुए सुरंग हादसों ने एक समान सवाल खड़ा किया है—क्या भारत में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के दौरान सुरक्षा को पर्याप्त प्राथमिकता दी जा रही है?इनमें से “सुरंग हादसों से सबक क्यों नहीं लिया जाता?”, “रिपोर्ट बनती है, जांच होती है, लेकिन बदलाव कितना आता है?” और “सिलक्यारा से सिक्किम तक: क्यों बार-बार दोहराई जा रही है वही कहानी?” जैसी हेडिंग्स एक्सक्लूसिव न्यूज़ फीचर के लिए ज्यादा प्रभावी रहेंगी।

कैसे हुआ हादसा? 7 किलोमीटर लंबी टनल में 3 किलोमीटर अंदर फंसे मजदूर

जानकारी के मुताबिक, यह हादसा नामची जिले के समरदुंग इलाके में बन रही टनल में हुआ। यह सुरंग तीस्ता स्टेज-6 हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट के तहत बनाई जा रही है।

बताया जा रहा है कि करीब 7 किलोमीटर लंबी इस सुरंग में थलथाले-सिरवानी की ओर से लगभग 3 किलोमीटर अंदर अचानक लैंडस्लाइड हुआ। भूस्खलन के कारण टनल का प्रवेश मार्ग पूरी तरह मलबे से बंद हो गया, जिससे अंदर मौजूद मजदूर बाहर नहीं निकल सके।

हादसे के समय टनल के अंदर NHPC और पटेल इंजीनियरिंग के कर्मचारी, इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञ और मजदूर मौजूद थे।

पटेल इंजीनियरिंग के 21 और NHPC के 6 कर्मचारी होने की आशंका

प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, टनल में फंसे लोगों में पटेल इंजीनियरिंग के करीब 21 कर्मचारी और NHPC से जुड़े 6 लोग शामिल बताए जा रहे हैं। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि फंसे हुए लोगों की वास्तविक संख्या का सत्यापन अभी जारी है। राहत और बचाव एजेंसियां लगातार टनल के अंदर मौजूद लोगों का पता लगाने में जुटी हुई हैं।

मीथेन गैस बनी सबसे बड़ी चुनौती, बचावकर्मी भी हुए प्रभावित

रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सुरंग के अंदर मीथेन गैस की मौजूदगी ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। अधिकारियों के मुताबिक, गैस के कारण कई बचावकर्मियों को चक्कर आने की शिकायत हुई, जबकि कुछ कर्मी बेहोश भी हुए। आशंका जताई जा रही है कि भूस्खलन के कारण जमीन और चट्टानों की परतें खिसकीं, जिससे अंदर फंसी गैस बाहर निकल आई। इसके अलावा सुरंग का संकरा रास्ता और कम रोशनी भी बचाव अभियान में बाधा बन रही है। बचाव दल गैस मॉनिटरिंग सिस्टम, सुरक्षा उपकरणों और विशेष तकनीक की मदद से धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है।

NDRF, SDRF और पुलिस की टीमें मौके पर तैनात

जिला प्रशासन को हादसे की सूचना सोमवार दोपहर करीब 3:40 बजे मिली। इसके तुरंत बाद NDRF, SDRF, जिला पुलिस और फायर सर्विस की टीमों को मौके पर भेजा गया। बंगाल से भी विशेष रेस्क्यू टीम को बुलाया गया है, जो गैस से निपटने के लिए विशेष सुरक्षा उपकरणों के साथ पहुंची है। मौके पर एंबुलेंस और मेडिकल टीमों को भी तैनात किया गया है। प्रशासन का कहना है कि पहली प्राथमिकता टनल में फंसे सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालना है। हादसे के कारणों की जांच बाद में की जाएगी।


मजदूरों ने सुनी थी तेज आवाज, फिर मचा था हड़कंप

हादसे से सुरक्षित बाहर निकले कुछ मजदूरों ने बताया कि घटना से ठीक पहले सुरंग के अंदर तेज आवाज सुनाई दी थी। इसके तुरंत बाद मलबा गिरने लगा और टनल के अंदर अफरा-तफरी मच गई।

कुछ मजदूर किसी तरह बाहर निकलने में सफल रहे, लेकिन कई लोग अंदर ही फंस गए।

लगातार बारिश और अस्थिर पहाड़ों ने बढ़ाई मुश्किल

सिक्किम में लगातार हो रही बारिश के कारण पहाड़ी क्षेत्र पहले से ही संवेदनशील बने हुए हैं। भूस्खलन के बाद सुरंग के आसपास की जमीन अस्थिर हो गई है, जिससे बचाव दलों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है। NDRF, SDRF, सिक्किम पुलिस, फायर एंड इमरजेंसी सर्विस और स्थानीय प्रशासन की टीमें संयुक्त रूप से रेस्क्यू अभियान चला रही हैं।

पहले भी हो चुके हैं देश में बड़े सुरंग हादसे

भारत में निर्माणाधीन सुरंगों में हादसों का इतिहास रहा है।

उत्तराखंड सिलक्यारा टनल हादसा (2023)

चारधाम परियोजना की सिलक्यारा-बारकोट सुरंग में हिस्सा ढहने के बाद 41 मजदूर करीब 16 दिनों तक अंदर फंसे रहे थे। बाद में सभी मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला गया था।

तेलंगाना सुरंग हादसा (2025)

नागरकुर्नूल में श्रीशैलम लेफ्ट बैंक कैनाल प्रोजेक्ट की सुरंग में धंसने की घटना में कई मजदूर फंस गए थे।

हिमाचल प्रदेश सुरंग हादसा (2022)

मंडी में निर्माणाधीन सुरंग का हिस्सा गिरा था, हालांकि इस हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई थी।

क्यों होते हैं पहाड़ी सुरंगों में हादसे?

भूगर्भीय जोखिम सबसे बड़ा कारण

हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय रूप से बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। कमजोर चट्टानें, पानी का रिसाव और भारी बारिश के कारण यहां भूस्खलन का खतरा बना रहता है।

भू-तकनीकी सर्वे में कमी

विशेषज्ञों के अनुसार, सुरंग निर्माण से पहले विस्तृत भूगर्भीय अध्ययन बेहद जरूरी होता है। कमजोर चट्टानों या गैस की मौजूदगी का समय रहते पता नहीं चलने पर खतरा बढ़ जाता है।

सुरक्षा मानकों पर सवाल

सुरंग निर्माण में आपातकालीन निकासी मार्ग, गैस डिटेक्शन सिस्टम, वेंटिलेशन और सुरक्षा उपकरणों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। इन व्यवस्थाओं में कमी हादसों को गंभीर बना सकती है।

बढ़ता निर्माण दबाव

पहाड़ी क्षेत्रों में तेजी से हो रहे सड़क, रेलवे और हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के कारण पर्यावरण और सुरक्षा को लेकर विशेषज्ञ लगातार सवाल उठाते रहे हैं।

अब सबसे बड़ी चुनौती: अंदर फंसे मजदूरों को सुरक्षित निकालना

सिक्किम टनल हादसे में फिलहाल पूरा ध्यान रेस्क्यू ऑपरेशन पर है। खराब मौसम, गैस रिसाव और मलबे के बीच बचाव दल लगातार अंदर फंसे मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। प्रशासन का कहना है कि हर संभव संसाधन लगाकर राहत अभियान जारी रखा गया है।

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