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आम आदमी की रसोई पर महंगाई का क्रूर प्रहार : जून में थोक महंगाई 9.81% बढ़ी, खाने-पीने की चीजें हुई महंगी

नई दिल्ली । नई दिल्ली की ठंडी सरकारी फाइलों से आज थोक महंगाई (WPI) के जो आँकड़े जारी हुए हैं, वे सिर्फ कागज़ी नंबर्स नहीं हैं, बल्कि देश के करोड़ों परिवारों की थाली से गायब होते पोषण और आम इंसान. . .

नई दिल्ली । नई दिल्ली की ठंडी सरकारी फाइलों से आज थोक महंगाई (WPI) के जो आँकड़े जारी हुए हैं, वे सिर्फ कागज़ी नंबर्स नहीं हैं, बल्कि देश के करोड़ों परिवारों की थाली से गायब होते पोषण और आम इंसान के बढ़ते मानसिक तनाव की एक दर्दनाक दास्तान हैं। जून के महीने में थोक महंगाई बढ़कर 9.87% पर पहुँच गई है। यह पिछले 44 महीनों (लगभग पौने चार साल) का सबसे उच्चतम स्तर है। जब सरकारी रिपोर्ट कहती है कि “रोजमर्रा की जरूरत का सामान महंगा हो गया है”, तो इसका सीधा और कड़वा मतलब यह होता है कि एक आम पिता को अपनी जेब देखकर बच्चों की दूध और फलों की ज़िद को अनसुना करना पड़ रहा है।

रसोई का बजट ध्वस्त: जब बुनियादी भोजन भी ‘लक्जरी’ बन जाए

महंगाई दर का यह उछाल सीधे तौर पर हमारे जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत यानी भोजन पर प्रहार कर रहा है।

  • रोटी-सब्जी की चिंता: रोजाना की जरूरत वाले सामानों (प्राइमरी आर्टिकल्स) की महंगाई सीधे 4.99% से छलांग लगाकर 7.00% हो गई है।
  • थाली से गायब होता पोषण: खाने-पीने की चीजों का फूड इंडेक्स 4.49% से बढ़कर 6.14% पर पहुंच गया है।
  • आलू-अदरक भी पहुँच से दूर: खुदरा बाजार में आलू, अदरक और बुनियादी सब्जियों के दाम आसमान छू रहे हैं। खुदरा महंगाई (CPI) लगातार छठे महीने बढ़कर 4.38% हो गई है, जो जनवरी में महज 2.74% थी।

एक आम वेतनभोगी या दिहाड़ी मजदूर के लिए इसका मानवीय पहलू यह है कि उसकी आमदनी वहीं खड़ी है, लेकिन पेट भरने की कीमत हर महीने बढ़ती जा रही है। दालों और सब्जियों की मात्रा लगातार छोटी होती जा रही है।

वैश्विक तनाव और घरेलू लाचारी

इस संकट के पीछे केवल मौसम या घरेलू बाजार नहीं हैं। अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे भू-राजनीतिक तनाव ने आम भारतीय की थाली को और महंगा कर दिया है। कच्चे तेल और वैश्विक अस्थिरता के कारण ईंधन और ऊर्जा की थोक महंगाई भले ही थोड़ी कम होकर 27.41% हुई हो, लेकिन यह स्तर भी एक आम नागरिक की कमर तोड़ने के लिए काफी है। जब ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है, तो खेत से सब्जी मंडी तक आने वाला हर दाना महंगा हो जाता है।

आँकड़ों के पीछे छिपा आम इंसान का संघर्ष

सरकार महंगाई को मापने के लिए होलसेल प्राइस इंडेक्स (WPI) और कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) का इस्तेमाल करती है:

इंडेक्स (Index)आम इंसान पर इसका वास्तविक मानवीय असर
थोक महंगाई (WPI – 9.87%)जब थोक दाम लंबे समय तक ऊंचे रहते हैं, तो छोटे दुकानदार और फैक्ट्रियां घाटा नहीं सह पातीं। वे इसका पूरा बोझ अंत में गरीब और मध्यमवर्गीय उपभोक्ता की जेब पर डाल देते हैं।
रिटेल महंगाई (CPI – 4.38%)यह वह कीमत है जो एक माँ राशन की दुकान पर सीधे नकद चुकाती है। लगातार 6 महीने से इसका बढ़ना बताता है कि आम नागरिक की बचत पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

‘पीपल टू पीपल’ संकट: मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों की बेबसी

इस महंगाई का सबसे गंभीर मानवीय पहलू यह है कि सरकार के पास भी टैक्स (Excise Duty) कटौती के अलावा इसे रोकने के सीमित साधन होते हैं। जब कारखानों में बनने वाले सामान (मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स) की महंगाई 7.48% पर टिकी रहे, तो रोजगार के नए अवसर बंद होने लगते हैं और छंटनी का खतरा बढ़ जाता है। एक कड़वी सच्चाई: जब हम कहते हैं कि “महंगाई 44 महीने के रिकॉर्ड स्तर पर है”, तो हमें यह समझना होगा कि यह देश के बुजुर्गों की दवाइयों में कटौती, बच्चों की स्कूल फीस के लिए मां-बाप का संघर्ष और त्योहारों की खुशियों पर छाने वाली मायूसी का नया रिकॉर्ड है। यह आँकड़ा एक चेतावनी है कि देश का आम नागरिक आर्थिक रूप से बेहद थका हुआ महसूस कर रहा है।

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