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ऐतिहासिक फैसला: ‘अधिकार की आड़ में प्रताड़ना भी दहेज है’-पत्नी की पैतृक संपत्ति पर कलकत्ता हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी

कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न और महिलाओं के कानूनी अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी पर उसके मायके की पुश्तैनी संपत्ति में. . .

कोलकाता। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने दहेज उत्पीड़न और महिलाओं के कानूनी अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पति अपनी पत्नी पर उसके मायके की पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा मांगने के लिए दबाव डालता है, तो कानूनन इसे ‘दहेज की मांग’ ही माना जाएगा। न्यायालय का यह फैसला महिलाओं के संपत्ति अधिकारों के दुरुपयोग को रोकने और वैवाहिक क्रूरता को परिभाषित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। आइए इस पूरे मामले और कोर्ट की टिप्पणियों को विस्तार से समझते हैं:

मुख्य फैसला: अधिकार की आड़ में मजबूरी ही दहेज है

न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय की खंडपीठ ने ‘सजल पारुई बनाम पश्चिम बंगाल राज्य’ मामले में यह ऐतिहासिक टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा: “यह सच है कि एक महिला कानूनी रूप से अपनी पैतृक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करने की हकदार है। लेकिन, जब यह मांग महिला की अपनी मर्जी से नहीं, बल्कि उसके पति के निर्देश, लगातार उत्पीड़न और दबाव के कारण की जाती है, तो हम यह नहीं कह सकते कि ऐसी मांग दहेज की मांग (Dowry Demand) के व्यापक दायरे में नहीं आएगी।”

क्या था पूरा मामला? (मामले की पृष्ठभूमि)

यह मामला साल 2014 का है, जब छायानिका नामक महिला ने अपने पति सजल पारुई के घर पर अपनी मासूम बेटी के साथ फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

  • विवाह और उत्पीड़न: दोनों की शादी 2010 में हुई थी। आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद ही पति और उसके परिवार ने अतिरिक्त पैसों के लिए महिला का शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शुरू कर दिया।
  • भाई ने पहले ही दे दिया था हिस्सा: मृतका के भाई ने अदालत को बताया कि उसने पहले ही परिवार की पुश्तैनी जमीन का एक हिस्सा बेचकर अपनी बहन को उसकी बिक्री राशि का आधा हिस्सा दे दिया था।
  • लगातार बढ़ता दबाव: इसके बावजूद, पति लगातार महिला पर दबाव बना रहा था कि वह अपने भाई से बची हुई बाकी पुश्तैनी संपत्ति को भी बेचने और उसका पैसा लाकर उसे सौंपने के लिए कहे। सुसाइड नोट से यह भी खुलासा हुआ कि पति ने धमकी दी थी कि यदि पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो वह दूसरी शादी कर लेगा।

बंद कमरों के अपराध: स्वतंत्र गवाहों की कमी पर कोर्ट का रुख

आरोपी पति के वकील ने दलील दी थी कि इस मामले में कोई भी स्वतंत्र बाहरी गवाह नहीं है, इसलिए अभियोजन पक्ष का दावा कमजोर है। इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने समाज की कड़वी सच्चाई को सामने रखा:

  • चारदीवारी का सच: अदालत ने कहा कि दहेज की मांग या प्रताड़ना आमतौर पर वैवाहिक घर की सुरक्षित चारदीवारी के भीतर ही की जाती है, न कि बाहरी लोगों या जनता के सामने।
  • गवाह की उम्मीद बेमानी: कोई भी पति स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में दहेज की मांग नहीं करेगा। इसलिए ऐसे मामलों में केवल परिवार के करीबी सदस्यों की गवाही और परिस्थितियों की कड़ियां ही सबसे अहम सबूत होती हैं।

एफआईआर (FIR) दर्ज होने में देरी पर कानूनी स्पष्टीकरण

बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि घटना के दो दिन बाद एफआईआर दर्ज कराई गई और शिकायत दर्ज कराने से पहले मृतका के भाई ने वकीलों से सलाह ली थी, इसलिए यह शिकायत संदिग्ध है। कोर्ट ने इस पर गहरी मानवीय संवेदना व्यक्त करते हुए कहा:

  • मानसिक सदमा: जब किसी व्यक्ति की बहन और उसके मासूम बच्चे की अचानक इस तरह दर्दनाक मृत्यु हो जाए, तो करीबी रिश्तेदार पूरी तरह स्तब्ध और अवाक रह जाते हैं। वे गहरे सदमे के कारण तुरंत कोई निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते।
  • कानूनी सलाह लेना तार्किक: ऐसी दुखद और गंभीर स्थिति में एफआईआर दर्ज करने से पहले कानूनी सलाह लेना शिकायतकर्ता की ओर से सबसे समझदारी भरा और तर्कसंगत कदम है। इस देरी से अभियोजन पक्ष का मामला बिल्कुल कमजोर नहीं होता।

कोर्ट का अंतिम फैसला: सास-ससुर बरी, पति की सजा में बदलाव

सबूतों और गवाहों के गहन विश्लेषण के बाद खंडपीठ ने निम्नलिखित निर्णय सुनाया:

सास-ससुर को मिली राहत

अदालत को मृतका के सास-ससुर (हरेंद्र चंद्र पारुई और रीना पारुई) के खिलाफ सीधे तौर पर प्रताड़ित करने या सक्रिय भूमिका निभाने का कोई ठोस और अकाट्य सबूत नहीं मिला। इसलिए कोर्ट ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।

पति की सजा आजीवन कारावास से घटकर 10 वर्ष हुई

अदालत ने पति सजल पारुई को दोषी माना, लेकिन उसकी आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि, “दहेज प्रताड़ना के कारण आत्महत्या के मामले हमारे समाज में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और आम हो गए हैं। हालांकि, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी (दहेज हत्या) के तहत अधिकतम सजा यानी आजीवन कारावास का प्रावधान केवल दुर्लभ से दुर्लभतम (Exceptional) मामलों के लिए ही सुरक्षित रखा जाना चाहिए।”

इस फैसले के कानूनी मायने

कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य के मुकदमों के लिए एक नजीर (Precedent) बनेगा। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि पैसों का स्रोत चाहे कितना भी वैध या कानूनी क्यों न हो (जैसे कि पैतृक संपत्ति का अधिकार), यदि उसे हासिल करने के पीछे पति का लालच, जबरदस्ती और क्रूरता शामिल है, तो कानून उसे ‘दहेज उत्पीड़न’ की श्रेणी में ही रखेगा।

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