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फ्रांस में आसमान से बरसने लगी आग! 40°C के पार पहुंचा तापमान, अबतक 55 लोगों की मौत, क्या जलवायु परिवर्तन है सबसे बड़ा कारण?

पेरिस। फ्रांस इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि देश के कई हिस्सों में हीट इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी है। राजधानी पेरिस में इस सप्ताह तापमान 40°C के पार पहुंच गया, जो. . .

पेरिस। फ्रांस इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि देश के कई हिस्सों में हीट इमरजेंसी घोषित करनी पड़ी है। राजधानी पेरिस में इस सप्ताह तापमान 40°C के पार पहुंच गया, जो पिछले लगभग 150 वर्षों के मौसम रिकॉर्ड में बेहद असामान्य माना जा रहा है। दक्षिण-पश्चिमी फ्रांस के पिस्सॉस में तापमान 44.3°C दर्ज किया गया, जबकि पूरे देश का औसत तापमान 29.8°C रिकॉर्ड हुआ। यह अब तक के सभी पुराने रिकॉर्ड तोड़ चुका है। फ्रांस के आधे से अधिक हिस्से में रेड हीट अलर्ट लागू है। भीषण गर्मी के चलते 55 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, वहीं नदियों और झीलों में राहत तलाशने गए कई लोगों की डूबने से भी जान चली गई।

आखिर फ्रांस अचानक हीट-चैंबर क्यों बन गया?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस भीषण गर्मी की सबसे बड़ी वजह ‘हीट डोम’ (Heat Dome) है। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे हाई-प्रेशर ब्लॉकिंग सिस्टम कहा जाता है। जब वायुमंडल के ऊपरी हिस्से में मजबूत हाई प्रेशर क्षेत्र बनता है, तो वह ढक्कन की तरह गर्म हवा को एक सीमित क्षेत्र में कैद कर देता है। यह गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती और लगातार नीचे की ओर दबती रहती है। नीचे आते-आते हवा और अधिक गर्म हो जाती है, जिससे तापमान लगातार बढ़ता जाता है। इस बार फ्रांस के ऊपर यह हीट डोम कई दिनों तक बना रहा, जिसके कारण रोज नए तापमान रिकॉर्ड टूटते गए।

यूरोप में गर्मी ज्यादा खतरनाक क्यों महसूस होती है?

यूरोप में सिर्फ तापमान ही समस्या नहीं है, बल्कि कई अन्य कारण भी गर्मी को अधिक घातक बना देते हैं।

घरों की बनावट : यूरोप के अधिकांश घर मोटी दीवारों और बेहतर इंसुलेशन वाले होते हैं। ये सर्दियों में तो गर्मी को अंदर बनाए रखते हैं, लेकिन गर्मियों में घर के भीतर की गर्मी बाहर निकलने नहीं देते।

एयर कंडीशनर की कमी : यूरोप के कई देशों में एसी का इस्तेमाल अभी भी सीमित है। ऐसे में हीटवेव के दौरान लोगों के पास राहत के विकल्प कम होते हैं।

अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव : शहरों की कंक्रीट की इमारतें और सड़कें दिनभर गर्मी सोखती हैं और रात में भी उसे छोड़ती रहती हैं, जिससे तापमान सामान्य नहीं हो पाता।

उमस : अधिक नमी के कारण पसीना जल्दी नहीं सूखता, जिससे शरीर खुद को ठंडा नहीं कर पाता और गर्मी का असर कई गुना बढ़ जाता है।

क्या इसके पीछे जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार है?

वैज्ञानिकों का जवाब है—**हां, काफी हद तक। वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन (WWA) के वैज्ञानिकों के अनुसार, 1976 में फ्रांस जैसी हीटवेव लगभग असंभव मानी जाती थी। यदि उस समय ऐसी गर्मी आती भी, तो तापमान आज की तुलना में लगभग 3.5 डिग्री सेल्सियस कम होता। यानी मानव-जनित जलवायु परिवर्तन ने हीटवेव की तीव्रता और आवृत्ति दोनों को बढ़ा दिया है। एक और चिंता ट्रॉपिकल नाइट्स’ हैं। इसका मतलब है ऐसी रातें, जब तापमान इतना अधिक रहता है कि शरीर को आराम और ठंडक नहीं मिल पाती। लगातार गर्म दिन और गर्म रातें हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ा देती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार की भीषण गर्मी के पीछे अल-नीनो नहीं, बल्कि जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग से बढ़ी ग्रीनहाउस गैसें प्रमुख कारण हैं। यही गैसें पृथ्वी के तापमान को तेजी से बढ़ा रही हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, यूरोप वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है।

समाधान क्या है?

फ्रांस की मौजूदा स्थिति पूरी दुनिया के लिए एक गंभीर चेतावनी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता तेजी से कम नहीं की गई, तो भविष्य में ऐसी हीटवेव और भी लंबी, अधिक तीव्र और जानलेवा होती जाएंगी। इस चुनौती से निपटने के लिए सौर और पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा को तेजी से अपनाना होगा। इसके साथ ही जंगलों का संरक्षण, हरित क्षेत्रों का विस्तार और ऐसे शहरों का विकास जरूरी है जो अत्यधिक गर्मी का सामना करने में सक्षम हों। विशेषज्ञों की चेतावनी साफ है, यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में ऐसी भीषण गर्मी अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बन सकती है।

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