डेस्क। थलपति विजय के करोड़ों फैंस के लिए ‘जन नेता’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक इमोशनल विदाई है। तीन दशक तक अपनी शानदार एक्टिंग, जबरदस्त डांस मूव्स और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस से थिएटर्स में जश्न का माहौल बनाने वाले विजय अब सिनेमा से दूरी बनाकर राजनीति की दुनिया में कदम रख चुके हैं। ऐसे में निर्देशक एच. विनोद की यह फिल्म उनके फिल्मी सफर का आखिरी पड़ाव बनकर सामने आती है। फिल्म का टाइटल ही काफी कुछ कह देता है। ‘जन नेता’ उस बदलाव की ओर इशारा करता है, जहां पर्दे का हीरो अब जनता के बीच एक नेता बनने की राह पर निकल चुका है। लेकिन सवाल यही है कि क्या विजय की आखिरी फिल्म सिर्फ फैंस के इमोशंस पर चलेगी या फिर इसमें दमदार कहानी, एक्शन और मनोरंजन का पूरा पैकेज भी मिलेगा? आइए जानते हैं।
कहानी: जेल से शुरू होती है एक ऐसे हीरो की जंग
फिल्म की शुरुआत मदुरै की एक जेल से होती है, जहां वेत्री (थलपति विजय) सजा काट रहा है। लेकिन कहानी का सबसे बड़ा ट्विस्ट ये है कि उसे जेल भेजने वाला कोई पुलिस अफसर नहीं, बल्कि उसकी अपनी मां (रेवती) है।वेत्री भले ही एक कैदी नजर आता है, लेकिन उसके अंदर छिपा इंसान बेहद खास है। कहानी तब नया मोड़ लेती है जब जेल वॉर्डन श्रीकांत (गौतम वासुदेव मेनन) अपनी आखिरी सांसों से पहले अपनी बेटी विजी की जिम्मेदारी वेत्री को सौंप देता है।वेत्री का सपना है कि विजी देश की सेना में अफसर बने। लेकिन उसकी जिंदगी में खतरा बनकर आता है इंटरनेशनल क्रिमिनल जॉन हिमलर (बॉबी देओल)। जॉन ऐसा खतरनाक अपराधी है, जो सरकारों तक को चुनौती देता है और भारत में तबाही फैलाने के लिए हथियारों से भरे जहाज पर कब्जा कर लेता है। अब वेत्री के सामने दो बड़ी जिम्मेदारियां हैं—एक तरफ विजी की सुरक्षा और दूसरी तरफ जॉन हिमलर के आतंक का अंत। यही जंग फिल्म की पूरी कहानी को आगे बढ़ाती है।
फैंस के लिए फिल्म नहीं, एक सेलिब्रेशन
अगर आप थलपति विजय के कट्टर फैन हैं, तो ‘जन नेता’ आपके लिए किसी त्योहार से कम नहीं है। फिल्म के हर बड़े पल में विजय की मौजूदगी महसूस होती है। उनके पुराने अंदाज, आइकॉनिक डायलॉग्स और फैंस से जुड़े कई रेफरेंस फिल्म को एक खास इमोशनल टच देते हैं। ‘थलपति कचेरी’ गाने में विजय का डांस देखकर ऐसा लगता है जैसे वह खुद अपने फैंस के साथ अपनी आखिरी फिल्म का जश्न मना रहे हों। सेकेंड हाफ में फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं रहती, बल्कि विजय के विजन और उनकी पर्सनैलिटी का सेलिब्रेशन बन जाती है। फिल्म में तमिलनाडु की राजनीति और एमजीआर से जुड़े कई संदर्भ भी देखने को मिलते हैं, जो खासकर विजय के फैंस को काफी पसंद आएंगे। हालांकि कुछ राजनीतिक बातें हिंदी दर्शकों के लिए थोड़ी नई लग सकती हैं, लेकिन विजय का करिश्मा पूरी फिल्म में दर्शकों को बांधे रखता है।
स्टाइलिश एक्शन और मास मोमेंट्स का शानदार कॉम्बिनेशन
एच. विनोद ने फिल्म के एक्शन सीन्स को काफी स्टाइलिश तरीके से पेश किया है। विजय की एंट्री, फाइट सीक्वेंस और बड़े-बड़े मास मोमेंट्स थिएटर में जबरदस्त माहौल बनाने का काम करते हैं। अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। विजय की एंट्री के समय बजने वाला म्यूजिक उनके स्टारडम को और बढ़ा देता है। हालांकि एडिटिंग पर थोड़ा और काम किया जाता तो फिल्म ज्यादा तेज और असरदार बन सकती थी। कुछ हिस्से लंबे महसूस होते हैं।
आखिरी फिल्म में भी वही पुराना जलवा
वेत्री के किरदार में थलपति विजय ने अपना पूरा अनुभव और स्टार पावर लगा दी है। उनका स्वैग, एक्शन, इमोशन और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की जान है। चाहे वह बिना कुछ बोले सिर्फ अपने एक्सप्रेशन से असर छोड़ना हो या फिर दमदार डायलॉग बोलना, विजय हर सीन में छा जाते हैं। उनके फैंस के लिए उनके छोटे-छोटे मोमेंट्स भी तालियों और सीटियों की वजह बन जाते हैं।
विलेन बनकर फिर मचाया धमाल
‘एनिमल’ के बाद बॉबी देओल एक बार फिर खतरनाक अंदाज में नजर आते हैं। जॉन हिमलर के किरदार में उन्होंने अपनी शानदार बॉडी लैंग्वेज और शांत लेकिन डरावने अंदाज से प्रभाव छोड़ा है। विजय और बॉबी देओल के बीच आमने-सामने वाले सीन्स फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं। दोनों स्टार्स की टक्कर देखने लायक है।
ममिता बैजू बनीं फिल्म का सरप्राइज पैकेज
फिल्म में पूजा हेगड़े, ममिता बैजू और बाकी कलाकारों की अपनी-अपनी भूमिका है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं ममिता बैजू। विजी के किरदार में उन्होंने इमोशनल गहराई दिखाई है। विजय के साथ उनकी बॉन्डिंग फिल्म को एक खूबसूरत पिता-बेटी वाला एहसास देती है। वहीं पूजा हेगड़े का किरदार सीमित है और उन्हें ज्यादा स्क्रीन स्पेस नहीं मिलता।
बाकी कलाकारों ने भी संभाला मोर्चा
फिल्म में प्रकाश राज, प्रियामणि, गौतम वासुदेव मेनन, रेवती, नरेन और कई अन्य कलाकार नजर आते हैं। सभी ने अपने किरदारों के साथ न्याय करने की कोशिश की है और कहानी को मजबूत बनाया है।
थोड़ी लंबी कहानी और ज्यादा भाषणबाजी
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबी अवधि है। कुछ जगहों पर कहानी धीमी पड़ जाती है। कई राजनीतिक संदेशों और भाषणों को थोड़ा छोटा किया जा सकता था, जिससे फिल्म ज्यादा प्रभावी बनती।
विजय फैंस के लिए ये फिल्म नहीं, एक इमोशनल फाइनल सीटी है
कुल मिलाकर, ‘जन नेता’ थलपति विजय के 30 साल के शानदार फिल्मी सफर को दिया गया एक भव्य सम्मान है। फिल्म में जबरदस्त एक्शन, इमोशन, विजय का स्टारडम, ममिता बैजू की शानदार परफॉर्मेंस और अनिरुद्ध का धमाकेदार संगीत इसे खास बनाते हैं। अगर आप विजय के फैन हैं और थिएटर में उनके नाम पर आखिरी बार सीटी और तालियां बजाना चाहते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए जरूर बनी है।