डेस्क।तुर्किये के मध्य भाग में स्थित कोन्या प्लेन, जिसे देश की “अनाज की टोकरी” कहा जाता है, आज एक अजीब और डरावनी प्राकृतिक घटना का केंद्र बन चुका है। कभी जहां दूर-दूर तक लहलहाते खेत नजर आते थे, अब वहां अचानक जमीन के धंस जाने से बने गहरे गड्ढे दिखाई दे रहे हैं, जो पूरी खेती को एक झटके में निगल रहे हैं।यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों और सरकारी रिपोर्ट्स से सामने आई एक गंभीर हकीकत है। अब तक इस क्षेत्र में 684 से अधिक विशाल सिंकहोल (स्थानीय भाषा में ‘ओब्रुक’) दर्ज किए जा चुके हैं और यह संख्या तेजी से 700 के पार पहुंचने की ओर है।
रातों-रात गायब हो जाती है उपजाऊ जमीन
ड्रोन से ली गई तस्वीरों में ऐसे भयावह दृश्य सामने आए हैं, जहां खेतों के बीचों-बीच सैकड़ों फीट गहरे और बेहद चौड़े गड्ढे बन चुके हैं। कई सिंकहोल इतने विशाल हैं कि उन्हें 30 मंजिला इमारतों की गहराई के बराबर बताया जा रहा है। ये गड्ढे अचानक बनते हैं और देखते ही देखते पूरी फसल को अपने अंदर समा लेते हैं।
किसान हर दिन इस अनिश्चित खतरे के साए में खेती करने को मजबूर हैं, क्योंकि उन्हें नहीं पता कि अगला गड्ढा कब और कहां बन जाएगा।
जमीन क्यों धंस रही है?
भू-वैज्ञानिकों के अनुसार, कोन्या क्षेत्र की जमीन मुख्य रूप से चूना पत्थर (लाइमस्टोन) से बनी है। लंबे समय तक सूखा पड़ने और लगातार भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण भूमिगत पानी का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है। जब पानी हट जाता है, तो जमीन के नीचे मौजूद खोखली संरचनाएं कमजोर हो जाती हैं और ऊपर की भारी मिट्टी अचानक धंसकर विशाल गड्ढों का रूप ले लेती है।
नासा की चेतावनी और बढ़ती वैश्विक चिंता
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भी चेतावनी दी है कि इस क्षेत्र में जलाशयों का स्तर पिछले 15 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है। यह संकेत है कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक जल संकट की ओर इशारा करती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि भूजल के अत्यधिक दोहन और फसल पैटर्न में बदलाव को लेकर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो यह खतरा केवल तुर्किये तक सीमित नहीं रहेगा।
दुनिया के लिए खतरे की घंटी
विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका के कुछ कृषि क्षेत्र और भारत के पंजाब-हरियाणा जैसे इलाके भी भूजल के अत्यधिक उपयोग के कारण इसी तरह के जोखिम की ओर बढ़ रहे हैं। यह घटना एक चेतावनी की तरह देखी जा रही है—कि अगर पानी और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित उपयोग नहीं किया गया, तो उपजाऊ धरती भी धीरे-धीरे खुद अपने अंदर धंसने लगेगी। धरती का यह बदलता व्यवहार प्रकृति की ओर से एक स्पष्ट संदेश माना जा रहा है—संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग अब खुद धरती को अस्थिर कर रहा है।