डेस्क। नेपाल के रसुवा में आए भीषण सैलाब के बाद त्रिशूली और नारायणी से होते हुए बिहार की गंडक नदी में भारी तबाही का मलबा पहुंचा। गोपालगंज, बगहा और वाल्मीकिनगर के घाटों पर तेज बहाव के साथ 90 से 100 किलोग्राम तक की विशालकाय मछलियां बहकर मैदानों में आ गईं। स्थानीय लोग इसे ‘बाघड़’ या ‘गोइता’ कहते हैं, जबकि इसका वास्तविक नाम गूंछ कैटफिश (Bagarius yarrelli) है। इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘जायंट डेविल कैटफिश’ के नाम से भी जाना जाता है।
पहाड़ी नदियों का हिंसक शिकारी: शारीरिक बनावट और आदतें
यह कोई सामान्य रोहू या कतला जैसी शांत मछली नहीं, बल्कि तेज बहाव वाले पथरीले पानी की शीर्ष शिकारी है:
- विशाल आकार: यह 2 मीटर तक लंबी और 100 किलोग्राम से अधिक वजनी हो सकती है।
- घातक जबड़े: इसका सिर चौड़ा व चपटा होता है और मुंह में पीछे की तरफ मुड़े हुए नुकीले दांत होते हैं, जिससे शिकार का छूटना असंभव हो जाता है।
- संवेदी मूंछें: मुंह के पास चार जोड़ी मूंछें (बार्बेल्स) सेंसर का काम करती हैं, जिनकी मदद से यह मटमैले पानी में भी शिकार की गंध और कंपन भांप लेती है।
- प्राकृतिक आवास: यह हिमालयी नदियों की गहरी तलहटियों में, तेज ऑक्सीजन वाले प्रवाह में पत्थरों के बीच छिपकर रहती है। बाढ़ के भीषण करंट ने इन्हें इनके प्राकृतिक आवास से उखाड़कर मैदानी इलाकों में फेंक दिया।
‘आदमखोर’ होने का रहस्य: वैज्ञानिक सच बनाम सनसनीखेज मिथक
1998 से 2007 के दौरान भारत-नेपाल सीमा पर बहने वाली काली नदी में कुछ तैराकों के रहस्यमयी तरीके से डूबने के बाद इसे ‘आदमखोर’ कहा जाने लगा। टीवी शो रिवर मॉन्स्टर्स (जेरेमी वेड) ने इस कहानी को दिखाकर इसे दुनिया भर में चर्चित कर दिया।
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: जीव वैज्ञानिकों के अनुसार, गूंछ मछली जानबूझकर इंसानों का शिकार नहीं करती।
- मौकापरस्त फीडर: नदी किनारे श्मशान घाटों से बहाए गए अधजले शवों या अवशेषों को यह विशाल मांसाहारी मछली खा सकती है।
- शारीरिक खतरा: 100 किलो की मछली में इतनी ताकत जरूर होती है कि तेज धारा में तैर रहे किसी इंसान को पानी के भीतर खींच ले, लेकिन इसका जीवित इंसानों को शिकार बनाने का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
स्वास्थ्य विभाग का सख्त अलर्ट: इसे खाने पर क्यों लगी रोक?
बिहार के मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग ने इसे पकड़ने, बेचने और खाने पर कड़ी चेतावनी जारी की है। इसके मुख्य वैज्ञानिक और चिकित्सीय कारण:
- सड़न और टॉक्सिन्स: ज्यादातर मछलियां बाढ़ के भारी मलबे, गंदगी और पत्थरों की चोट से पहले ही मर चुकी थीं। मरे हुए मांस में तुरंत हानिकारक बैक्टीरिया पनपने लगते हैं।
- संक्रमण का खतरा: बाढ़ के पानी में मृत मवेशियों और सड़े-गले तत्वों को खाने के कारण इनके शरीर में ई-कोलाई, साल्मोनेला, गंभीर फंगस और पैथोजेन्स की भरमार हो सकती है।
- फूड पॉइजनिंग: इसे खाने वाले कई लोगों में उल्टी, दस्त और पेट के गंभीर संक्रमण के मामले सामने आए हैं।
(कुछ लोग इसके डरावने रूप को देखकर इसे प्रतिबंधित ‘थाई मांगुर’ समझ रहे हैं, हालांकि यह हिमालयी गूंछ ही है, लेकिन स्वास्थ्य के लिहाज से दोनों ही इस समय अत्यंत नुकसानदेह हैं।)