कोलकाता। पश्चिम बंगाल की पहचान मानी जाने वाली हिलसा मछली अब केवल नदियों और समुद्र तक सीमित नहीं रह सकती। वैज्ञानिकों की वर्षों की मेहनत रंग लाती दिख रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिक तालाबों में हिलसा पालन की दिशा में बड़ा प्रयोग कर रहे हैं, जो अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है। यदि यह शोध सफल रहा तो पहली बार निजी तालाबों में भी हिलसा मछली का उत्पादन संभव होगा, जिससे इसकी बढ़ती मांग को पूरा करने में मदद मिलेगी।
एक दशक से चल रहा है शोध
काकद्वीप स्थित केंद्रीय खारे पानी के मत्स्य पालन संस्थान (ICAR-CIBA) के वैज्ञानिक पिछले करीब 10 वर्षों से हिलसा के कृत्रिम पालन पर शोध कर रहे हैं। इस दौरान पश्चिम बंगाल के 982 तालाबों में अलग-अलग स्तर पर प्रयोग किए गए हैं। अब वैज्ञानिक इस परियोजना के छठे और अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि असली सफलता तब मानी जाएगी जब नियंत्रित वातावरण में हिलसा के अंडों से स्वस्थ बच्चों का सफलतापूर्वक जन्म हो जाएगा। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए अंतिम परीक्षण शुरू किया गया है।
60 लाख रुपये की हाईटेक परियोजना
इस चरण के लिए अत्याधुनिक लवणता प्रवणता पुनर्संचारी मत्स्य पालन प्रणाली (Recirculatory Aquaculture System-RAS) विकसित की गई है। इस परियोजना पर लगभग 60 लाख रुपये खर्च किए गए हैं। परियोजना का उद्घाटन सुंदरबन विकास मंत्री दीपांकर जाना ने किया। इस अवसर पर ICAR-CIBA के निदेशक डॉ. कुलदीप के. लाल और काकद्वीप अनुसंधान केंद्र के प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. देबाशीष डे समेत कई विशेषज्ञ मौजूद रहे।
अलग-अलग पानी के वातावरण में होगा परीक्षण
मुख्य वैज्ञानिक डॉ. देबाशीष डे ने बताया कि इस परियोजना में तीन प्रकार के जल वातावरण तैयार किए गए हैं। इनमें पानी की लवणता, तापमान, प्रवाह और गुणवत्ता को वैज्ञानिक तरीके से नियंत्रित किया जा रहा है। इन विशेष टैंकों में हिलसा के बच्चों को छोड़कर उनके विकास और व्यवहार पर लगातार निगरानी रखी जाएगी। उन्होंने बताया कि यह परीक्षण करीब एक वर्ष तक चलेगा। इसके बाद प्राप्त परिणामों के आधार पर तय किया जाएगा कि तालाबों में व्यावसायिक स्तर पर हिलसा पालन संभव है या नहीं।
बंगाल की संस्कृति से जुड़ी है हिलसा
हिलसा मछली का पश्चिम बंगाल की संस्कृति और खान-पान में विशेष स्थान है। बंगाली समाज में इसे ‘माछेर राजा’ यानी मछलियों का राजा कहा जाता है। यह समुद्री मछली प्रजनन के लिए हर साल नदियों के मीठे पानी की ओर आती है, इसलिए इसका पालन-पोषण हमेशा चुनौतीपूर्ण माना जाता रहा है।
दुनिया के 11 देशों में मिलती है हिलसा
हिलसा मछली भारत समेत दुनिया के 11 देशों में पाई जाती है। भारत में इसका प्राकृतिक आवास महानदी, चिल्का झील, गोदावरी, रूपनारायण, हुगली और नर्मदा जैसी नदियां हैं। हालांकि, वैश्विक उत्पादन का लगभग 86 प्रतिशत हिस्सा अकेले बांग्लादेश से आता है, जहां हिलसा को राष्ट्रीय मछली का दर्जा प्राप्त है और यह देश की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
संरक्षण पर भी सरकार का फोकस
हिलसा की घटती संख्या को देखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार पहले से संरक्षण पर जोर दे रही है। वर्ष 2018 में राज्य सरकार ने छोटी हिलसा मछलियों के शिकार पर प्रतिबंध लगाया था, ताकि उनका प्राकृतिक प्रजनन प्रभावित न हो और भविष्य में इस बहुमूल्य प्रजाति की उपलब्धता बनी रहे।
यदि तालाबों में हिलसा पालन का यह प्रयोग सफल हो जाता है, तो इससे न केवल मछली उत्पादन में बढ़ोतरी होगी, बल्कि मत्स्य पालकों की आय बढ़ाने और बाजार में हिलसा की कीमतों को नियंत्रित करने में भी मदद मिल सकती है। इसे पश्चिम बंगाल के मत्स्य क्षेत्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।