नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक ऐतिहासिक सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में ‘बहुसंख्यकवाद’ कभी भी संविधान से ऊपर नहीं हो सकता। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि भले ही लोकतंत्र बहुमत से चलता हो, लेकिन संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करना और धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता की कसौटी पर परखना अदालतों का अनिवार्य दायित्व है।
किन याचिकाओं की सुनवाई कर रहा था सक
सुप्रीम कोर्ट ने केरल के सबरीमाला मंदिर सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और दाऊदी बोहरा समुदाय सहित कई धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यदि कोई प्रथा ‘सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य’ का उल्लंघन करती है, तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं।
केंद्र ने दी दलील
केंद्र सरकार की ओर से पेश तुषार मेहता ने सुनवाई के पंद्रहवें दिन अपनी जवाबी दलीलें पेश करते हुए कहा कि विधायिका समाज में चल रही बुराइयों के प्रति हमेशा सजग रहती है। उन्होंने कहा कि धर्म के भीतर से ही सुधार आते हैं। जैसे ‘सती’ प्रथा एक सामाजिक बुराई थी और उसमें सुधार किया गया। प्रश्न यह है कि क्या कोर्ट धर्म का सुधारक बन सकता है?
कानून पारित करने से पहले अपनाई जाती है प्रक्रिया
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मेरा विनम्र और स्पष्ट उत्तर ‘नहीं’ होगा। इसका कारण यह है कि संविधान की व्यवस्था सुधार का दायित्व विधायिका को सौंपती है…। उन्होंने कहा कि किसी कानून को पारित करने से पहले विस्तृत प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसमें प्रवर समिति विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को आमंत्रित करती है और परामर्श की प्रक्रिया चलती है।
सरकार पर छोड़ रखा है सुधार का कार्य
उन्होंने कहा कि इस देश का प्रत्येक नागरिक संसद में अपने प्रतिनिधि के माध्यम से मौजूद है और जब कोई कानून पारित होता है, तो उसकी स्वीकार्यता न्यायिक फैसले की तुलना में कहीं अधिक होती है। इसलिए संसद ने सुधार का कार्य सरकार पर छोड़ रखा है।
जस्टिस अमानुल्लाह ने जताई असहमति
उनके इस कथन से असहमति जताते हुए जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा कि धार्मिक मुद्दों को केवल विधायिका पर छोड़ देने का तर्क स्वीकार्य नहीं है। जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ‘‘क्या इसका अर्थ यह है कि केवल बहुसंख्यकवाद के कारण… हमें ऐसा नहीं करना चाहिए?
“बहुसंख्यकवाद” शब्द के प्रयोग पर उठाया सवाल
जस्टिस अमानुल्लाह की टिप्पणी पर आश्चर्य जताते हुए मेहता ने “बहुसंख्यकवाद” शब्द के प्रयोग पर सवाल उठाया। मेहता ने कहा कि मुझे खेद है। यह लोकतंत्र है। लोकतंत्र का अर्थ बहुमत होता है। इस पर जस्टिस बागची ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि कोर्ट की चिंता बहुसंख्यकवाद को लेकर नहीं है। कोर्ट की वास्तविक चिंता यह है कि कहीं बहुसंख्यकवाद संविधानवाद पर हावी न हो जाए, और यही ‘लक्ष्मण रेखा’ है।
हम एक संवैधानिक लोकतंत्र भी हैं: जस्टिस बागची
जस्टिस बागची ने मौखिक रूप से कहा कि हम ऐसे लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध हैं जो निश्चित रूप से संख्या की कसौटी पर आधारित है, लेकिन हम एक संवैधानिक लोकतंत्र भी हैं। इसलिए यदि बहुमत यह महसूस करे कि कोई विशेष कार्य किया जाना चाहिए, तब भी अदालतों की भूमिका उस निर्णय को संवैधानिक सिद्धांतों की कसौटी पर परखने की रहती है।