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राम मंदिर चढ़ावा गबन मामला : कोषाध्यक्ष की चुप्पी से लेकर जांच की पारदर्शिता तक, उठ रहे कई बड़े सवाल

अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान में कथित गबन का मामला लगातार चर्चा में है। आधिकारिक तौर पर गबन की कुल रकम का खुलासा नहीं किया गया है, हालांकि अब तक 79.85 लाख रुपये बरामद. . .

अयोध्या। अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए दान में कथित गबन का मामला लगातार चर्चा में है। आधिकारिक तौर पर गबन की कुल रकम का खुलासा नहीं किया गया है, हालांकि अब तक 79.85 लाख रुपये बरामद होने की बात कही गई है। मामले के सामने आने के बाद पहले विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया और बाद में एफआईआर दर्ज हुई। इस प्रक्रिया को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं।
इसी बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। दोनों के करीबी लोगों के कथित रूप से दान गबन में शामिल होने के आरोप हैं। विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा है कि आवश्यकता पड़ने पर चंपत राय से भी पूछताछ की जा सकती है। हालांकि पूरे घटनाक्रम के बावजूद कई अहम सवाल अब भी अनुत्तरित हैं।

कोषाध्यक्ष की भूमिका पर क्यों नहीं हो रही चर्चा?

पूरे मामले में ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी का नाम लगभग चर्चा से बाहर है। चूंकि ट्रस्ट की वित्तीय व्यवस्था और दान की निगरानी की जिम्मेदारी कोषाध्यक्ष के दायरे में आती है, ऐसे में उनकी भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
कुछ अपुष्ट रिपोर्टों में दावा किया गया है कि दान की गिनती से जुड़े कुछ लोग राशि निजी खातों में जमा करा रहे थे। इसके बावजूद स्वामी गोविंद देव गिरी ने अब तक सार्वजनिक रूप से इस मामले पर विस्तार से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। हाल ही में भीलवाड़ा में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों ने जब उनसे इस विषय पर सवाल पूछा तो उन्होंने टिप्पणी करने से परहेज किया।

एफआईआर में रकम और ट्रस्ट पदाधिकारियों का उल्लेख क्यों नहीं?

गबन के मामले में दर्ज एफआईआर को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। शिकायत में कथित गबन की अनुमानित राशि का उल्लेख नहीं किया गया है और न ही ट्रस्ट के किसी पदाधिकारी का नाम शामिल है। जबकि जांच में आठ लोगों को नामजद किया गया है, जिनमें दान की गिनती करने वाले कर्मचारी, ट्रस्ट पदाधिकारियों के करीबी और अन्य सहयोगी शामिल बताए गए हैं।

एफआईआर से पहले एसआईटी गठन पर भी सवाल

मामले के सामने आने के बाद सरकार ने पहले तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन किया, जिसने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट शासन को सौंपी। इसके बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि यदि वित्तीय अनियमितता का पता चल गया था तो तत्काल एफआईआर क्यों नहीं दर्ज हुई? साथ ही, एसआईटी की जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया और क्या उसी रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज की गई?

पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल

गबन की पुष्टि होने के बावजूद अब तक कई महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक नहीं की गई हैं। गबन की वास्तविक राशि, पूरी कार्यप्रणाली, जिम्मेदार लोगों की भूमिका और ट्रस्ट की जवाबदेही जैसे मुद्दों पर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। इसे लेकर पारदर्शिता की कमी के आरोप लगाए जा रहे हैं।

क्या धार्मिक स्थलों में दान व्यवस्था की समीक्षा जरूरी?

इस घटनाक्रम के बाद धार्मिक स्थलों पर नकद दान की व्यवस्था और उसके प्रबंधन को लेकर भी बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का एक वर्ग सुझाव दे रहा है कि बड़े धार्मिक संस्थानों में आधुनिक वित्तीय निगरानी, पेशेवर प्रबंधन और कॉर्पोरेट शैली की जवाबदेही लागू करने पर विचार किया जाना चाहिए। मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा भी पहले यह सुझाव दे चुके हैं कि मंदिर प्रबंधन के लिए एक पेशेवर सीईओ की नियुक्ति की जानी चाहिए।
अब इस पूरे मामले की जांच आगे किस दिशा में बढ़ती है और क्या सभी सवालों के जवाब सामने आते हैं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

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