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सत्ता से सड़क तक -कैसे बदल गया ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर : बड़ा सवाल-क्या वापसी संभव है या खत्म हो गया एक राजनीतिक अध्याय?

कोलकाता। एक समय पश्चिम बंगाल की राजनीति पर निर्विवाद दबदबा रखने वाली ममता बनर्जी आज अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजरती दिखाई दे रही हैं। जिस नेता ने तीन दशक से ज्यादा पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका था,. . .

कोलकाता। एक समय पश्चिम बंगाल की राजनीति पर निर्विवाद दबदबा रखने वाली ममता बनर्जी आज अपने सबसे कठिन राजनीतिक दौर से गुजरती दिखाई दे रही हैं। जिस नेता ने तीन दशक से ज्यादा पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका था, वही अब कथित तौर पर अपनी ही पार्टी में बगावत, सहयोगियों की बेरुखी और राजनीतिक अलगाव से घिरी हुई हैं। विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा। हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि पार्टी के कई विधायक और सांसद ममता का साथ छोड़ चुके हैं, जबकि संगठन की पकड़ भी लगातार कमजोर होती नजर आ रही है।

हर मोर्चे पर अकेली पड़ गईं ममता!

राजनीति में दोस्त और दुश्मन स्थायी नहीं होते, लेकिन परिस्थितियां स्थायी असर छोड़ जाती हैं। वर्षों तक केंद्र सरकार से टकराव, कांग्रेस से दूरी और वाम दलों के साथ लगातार संघर्ष की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी अब ऐसे मुकाम पर पहुंच गई हैं जहां उनके लिए राजनीतिक विकल्प बेहद सीमित दिखाई देते हैं। एक समय राष्ट्रीय राजनीति में ‘किंगमेकर’ की भूमिका निभाने वाली नेता आज कथित तौर पर अपने ही राजनीतिक भविष्य को लेकर संघर्ष करती नजर आ रही हैं।

जिस संगठन ने सत्ता दिलाई, वही अब सबसे बड़ी चुनौती?

तृणमूल कांग्रेस का संगठन कभी ममता की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था। गांव से लेकर शहर तक पार्टी का मजबूत कैडर उनकी राजनीतिक ताकत का आधार था। लेकिन अब यही संगठन अंदरूनी असंतोष और बगावत की खबरों के कारण संकट में बताया जा रहा है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं और कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

लेफ्ट को हराने से शुरू हुआ सफर, लेकिन आगे की राजनीति क्यों लड़खड़ा गई?

ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक अभियान वाम मोर्चे के खिलाफ संघर्ष से शुरू हुआ। उन्होंने सड़कों पर आंदोलन किए, धरने दिए और लगातार जनता के बीच अपनी पहचान बनाई। 2011 में उन्होंने वह कर दिखाया जिसकी लंबे समय तक किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 34 साल से सत्ता में बैठी वाम सरकार को हटाकर ममता मुख्यमंत्री बनीं और बंगाल की राजनीति में नया अध्याय शुरू हुआ। लेकिन सत्ता में आने के बाद प्रशासन, कानून-व्यवस्था और संगठन पर नियंत्रण को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा।

कांग्रेस से लेकर केंद्र तक… रिश्तों में बढ़ती दूरियां

ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस से की थी। बाद में मतभेद बढ़े और उन्होंने अलग होकर तृणमूल कांग्रेस बनाई। समय-समय पर उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) दोनों के साथ काम किया, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच दोनों राष्ट्रीय दलों के साथ उनके रिश्ते लगातार कमजोर होते गए। विश्लेषकों का मानना है कि यही दूरी आज उनके राजनीतिक विकल्पों को सीमित करती दिखाई दे रही है।

हार के बाद क्या तेज हो गई पार्टी में टूट?

चुनावी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ने की खबरें सामने आने लगीं। दावा किया जा रहा है कि कई विधायक और सांसद संगठन छोड़ चुके हैं, जबकि कई अन्य नेता भी दूरी बनाए हुए हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहता है तो तृणमूल कांग्रेस के लिए यह अब तक का सबसे बड़ा संगठनात्मक संकट साबित हो सकता है।

440 करोड़ की रकम फंसी? चुनाव आयोग और एजेंसियों की कार्रवाई ने बढ़ाई मुश्किलें

राजनीतिक संकट के बीच तृणमूल कांग्रेस पर कानूनी और वित्तीय दबाव भी बढ़ने की चर्चा है। दावों के मुताबिक, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पार्टी के बैंक खातों पर कार्रवाई की है, जिससे करोड़ों रुपये की राशि प्रभावित हुई है। वहीं पार्टी की मान्यता और चुनाव चिह्न को लेकर भी चुनाव आयोग के स्तर पर अनिश्चितता की बातें सामने आ रही हैं। इन घटनाओं ने पार्टी के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

सड़क से संसद तक… कैसे बनीं ममता की पहचान?

ममता बनर्जी ने कांग्रेस से राजनीति शुरू की और बहुत कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई। 1984 में उन्होंने दिग्गज नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर पहली बार लोकसभा पहुंचकर सबको चौंका दिया। बाद के वर्षों में कोलकाता दक्षिण सीट उनकी मजबूत राजनीतिक पहचान बन गई। 1997 में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस बनाई और धीरे-धीरे उसे बंगाल की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत में बदल दिया।

क्या गुस्सैल छवि बन रही है सबसे बड़ी कमजोरी?

ममता बनर्जी हमेशा अपनी आक्रामक शैली के लिए जानी जाती रही हैं। समर्थक इसे उनकी बेबाकी बताते हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक जिद का नाम देते हैं। हाल के दिनों में उनके व्यवहार और नेतृत्व शैली को लेकर पार्टी के भीतर भी सवाल उठने लगे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए संगठनात्मक संवाद और नेतृत्व में संतुलन बेहद जरूरी होता है।

सबसे बड़ा सवाल… क्या ममता वापसी कर पाएंगी?*

भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता रहे हैं जिन्होंने बड़ी हार के बाद भी शानदार वापसी की है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या ममता बनर्जी भी अपने संगठन को फिर से खड़ा कर पाएंगी, या फिर बंगाल की राजनीति में एक नए दौर की शुरुआत हो चुकी है। फिलहाल इतना तय है कि कभी बंगाल की सबसे ताकतवर नेता मानी जाने वाली ममता बनर्जी के सामने अब राजनीतिक अस्तित्व बचाने की सबसे कठिन चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है।

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