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Movie Review: बिना बोले ही हुमा कुरैशी ने ‘बेबी डू डाई डू’ में चलाया अभिनय का ‘छाता’, खामोशी के शोर में छुपा है तगड़ा सस्पेंस

मुंबई । मुख्यधारा की घिसी-पिटी मसाला फिल्मों और पारंपरिक थ्रिलर कहानियों के बीच, इस शुक्रवार सिनेमाघरों में एक बेहद अनूठी और साहसिक फिल्म रिलीज हुई है-‘बेबी डू डाई डू’। निर्देशक नचिकेत सामंत के निर्देशन और साकिब सलीम के निर्माण में. . .

मुंबई । मुख्यधारा की घिसी-पिटी मसाला फिल्मों और पारंपरिक थ्रिलर कहानियों के बीच, इस शुक्रवार सिनेमाघरों में एक बेहद अनूठी और साहसिक फिल्म रिलीज हुई है-‘बेबी डू डाई डू’। निर्देशक नचिकेत सामंत के निर्देशन और साकिब सलीम के निर्माण में बनी यह फिल्म हिंदी सिनेमा की पारंपरिक सीमाओं को तोड़ते हुए पल्प फिक्शन और डार्क ह्यूमर की एक नई दुनिया रचती है। 2 घंटे 05 मिनट की यह ‘A’ सर्टिफाइड एक्शन-क्राइम-थ्रिलर दर्शकों को मनोरंजन के साथ-साथ एक नया नजरिया देने का माद्दा रखती है

अतीत के साये और प्रतिशोध की अनोखी दास्तां

फिल्म की कहानी किसी बड़बोलेपन से नहीं, बल्कि एक गहरी खामोशी और बचपन के भयानक हादसे से शुरू होती है।

  • दिल दहलाने वाला अतीत: मुख्य किरदार ‘बेबी’ बोल और सुन नहीं सकती। बचपन में वह और उसकी जुड़वा बहन एक खाली पड़े पांच सितारा होटल में एक खौफनाक मर्डर की गवाह बन जाती हैं। हत्यारा बेबी की बहन का कत्ल कर देता है और बेबी किसी तरह जान बचाकर निकलती है।
  • अनोखा हथियार: बड़ी होकर बेबी, पीएम जैन (चंकी पांडे) के संपर्क में आकर सुपारी किलिंग के काले साम्राज्य का हिस्सा बन जाती है। वह इस दुनिया की सबसे शातिर ‘हिटवुमन’ बनती है, जिसका हथियार कोई बंदूक नहीं बल्कि एक खास किस्म का घातक छाता है।
  • असली मकसद: बेबी का अंतिम मकसद पेशेवर हत्यारा बने रहना नहीं, बल्कि अपनी बहन के असली कातिल को ढूंढकर उससे बदला लेना है। इसी बीच उसकी जिंदगी में प्यार की दस्तक होती है और कहानी प्रतिशोध से मुड़कर भावना, पहचान और मुक्ति के मोड़ पर आ खड़ी होती है।

अभिनय: हुमा कुरैशी का मास्टरक्लास और चंकी पांडे का चौंकाने वाला अवतार

  • हुमा कुरैशी: बिना एक भी शब्द बोले, सिर्फ अपनी आंखों के उतार-चढ़ाव और सधे हुए बॉडी लैंग्वेज से हुमा ने ‘बेबी’ के किरदार में जान फूंक दी है। उन्होंने पर्दे पर बिना मेकअप के आने का साहस दिखाया है, जो उनके किरदार को और प्रामाणिक बनाता है। यह उनके करियर के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में से एक है।
  • चंकी पांडे: अपनी कॉमेडी छवि से पूरी तरह उलट चंकी पांडे ने गिरोह के सरगना ‘पीएम जैन’ के रूप में एक बेहद शांत, क्रूर और गंभीर किरदार निभाकर सबको चौंका दिया है।
  • सहयोगी कलाकार: सिकंदर खेर ने शातिर बिल्डर के रूप में मजबूत छाप छोड़ी है। डीसीपी अंजुम खान के रूप में सीमा पाहवा का काम हमेशा की तरह सहज है। वहीं, बेबी के प्रेमी ‘सिद्धू’ के रूप में रचित सिंह बेहद ईमानदार और नॉन-टॉक्सिक हीरो के रूप में जमे हैं।

निर्देशन, नोआर ट्रीटमेंट और कड़क तकनीकी पक्ष

निर्देशक नचिकेत सामंत ने मुंबई के क्राइम नेटवर्क को ग्लैमरस दिखाने के बजाय एक संगठित व्यवस्था के रूप में पेश किया है, जहां हिंसा महज एक बिजनेस डील है।

  • सिनेमैटोग्राफी: टोजो जेवियर का कैमरा वर्क इस फिल्म की जान है। उन्होंने मुंबई की बारिश से भीगी सड़कों और तंग गलियों को ‘क्लासिक नोआर सिनेमा’ की शैली में कैद किया है।
  • जबरदस्त एक्शन: फिल्म की एडिटिंग चुस्त है। मुंबई लोकल ट्रेन के भीतर फिल्माया गया मर्डर सीक्वेंस रोंगटे खड़े कर देने वाला है।
  • स्मार्ट ईस्टर एग्स: फिल्म में समकालीन सिनेमा पर मजेदार कटाक्ष हैं, जैसे ‘अल्फा’ को लेकर किया गया इशारा और सोनाक्षी सिन्हा से जुड़ा एक स्मार्ट ईस्टर एग।

कहां चूक गई ‘बेबी’?

इतनी खूबियों के बाद भी फिल्म में कुछ कमियां खटकती हैं:

  1. धीमी शुरुआत: फिल्म का पहला हाफ थोड़ा धीमा है, जहां किरदारों को स्थापित करने में 10 से 12 मिनट का अतिरिक्त वक्त लिया गया है, जो थोड़ा बोर कर सकता है।
  2. सीक्वल की जबरन कोशिश: फिल्म का अंत पार्ट-2 की गुंजाइश के साथ होता है। चूंकि बेबी ने अपना बदला पूरा कर लिया है, ऐसे में अगले भाग के लिए उसके पास कोई पर्सनल मकसद नहीं बचता, जो इसे सिर्फ एक व्यावसायिक कोशिश बनाता है।

फिल्म की बड़ी खूबियां

  • दिमाग हिला देने वाला क्लाइमेक्स: फिल्म का दूसरा हाफ सस्पेंस और ट्विस्ट से भरा है, जिसका अंदाजा आखिरी वक्त तक नहीं लगाया जा सकता।
  • शानदार कैमरा वर्क: पानी की टपकती बूंदों से लेकर लॉन्ग शॉट्स तक, विजुअल्स कमाल के हैं।
  • थिएटर्स पर भरोसा: ऐसे दौर में जब महिला-प्रधान एक्शन फिल्मों को सीधे ओटीटी पर डाल दिया जाता है, इसे सिनेमाघरों में रिलीज करने का साहसिक फैसला सराहनीय है।

अंतिम फैसला

‘बेबी डू डाई डू’ कुछ छोटी कमियों के बावजूद एक बेहद ईमानदार, स्टाइलिश और मनोरंजक थ्रिलर फिल्म है। अगर आप पारंपरिक मसाला फिल्मों से हटकर कुछ नया, डार्क और सस्पेंस से भरपूर देखना चाहते हैं, तो हुमा कुरैशी के इस मूक लेकिन धमाकेदार अवतार को देखने सिनेमाघर जरूर जाएं।

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