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बिहार में दलित राजनीति का ‘पावर गेम, आमने-सामने चिराग पासवान और जीतन राम मांझी

पटना। बिहार एनडीए के दो बड़े नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। दिल्ली में एक युवक की मौत पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के “मर गया तो मर गया” बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए. . .

पटना। बिहार एनडीए के दो बड़े नेता एक-दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। दिल्ली में एक युवक की मौत पर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी के “मर गया तो मर गया” बयान पर कड़ी आपत्ति जताते हुए चिराग पासवान ने कहा था कि इस तरह की भाषा उचित नहीं है। यह पहला मौका नहीं है, जब चिराग पासवान ने मांझी के बयान की सार्वजनिक रूप से आलोचना की हो।
इससे पहले भी दोनों नेताओं के बीच कई बार जुबानी हमला देखने को मिला है। वहीं, जीतन राम मांझी भी लोजपा (रामविलास) प्रमुख पर निशाना साधने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। दरअसल, दोनों नेताओं के बीच यह सियासी टकराव बिहार के करीब 16 फीसदी दलित वोट बैंक पर नेतृत्व और प्रभाव को लेकर माना जाता है।

दलित वोट बैंक पर चिराग-मांझी की जंग

बिहार में दलित और महादलित समुदाय का करीब 16 फीसदी वोट बैंक माना जाता है। चिराग पासवान और जीतनराम मांझी दोनों ही खुद को इस वर्ग का बड़ा नेता मानते हैं। इनमें करीब 6 फीसदी आबादी पासवान समुदाय की है। रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके भाई पशुपति कुमार पारस और बेटे चिराग पासवान अलग हो गए, लेकिन पासवान समाज का बड़ा हिस्सा अब भी चिराग के साथ जुड़ा माना जाता है। इसी तरह करीब 6 फीसदी मुसहर समुदाय है, जिससे जीतन राम मांझी आते हैं। मुसहर समाज को मांझी का कोर वोट बैंक माना जाता है।
बिहार की एक दर्जन से अधिक सीटों पर दलित-महादलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। मांझी लगातार दावा करते रहे हैं कि बिहार में दलित राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ है। वह यह भी कहते हैं कि राज्य की करीब 40 सीटों पर जीत-हार तय करने में उनकी अहम भूमिका रहती है। हालांकि, बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले एनडीए में हुए सीट बंटवारे में चिराग पासवान ज्यादा प्रभावशाली नजर आए। गठबंधन में सीट शेयरिंग के दौरान मांझी की तुलना में चिराग का राजनीतिक कद अधिक मजबूत दिखा।

2024 में बदला चिराग का सियासी ग्राफ

2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में Chirag Paswan एनडीए का हिस्सा नहीं थे। उस चुनाव में उन्होंने 135 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। हालांकि, उनकी पार्टी को सिर्फ एक सीट पर जीत मिली, लेकिन माना गया कि चिराग की रणनीति की वजह से Nitish Kumar की पार्टी जदयू को 30 से ज्यादा सीटों का नुकसान हुआ।

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इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए के साथ लौटे चिराग पासवान का राजनीतिक कद तेजी से बढ़ा। उन्होंने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पांचों सीटों पर जीत दर्ज की। 2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में दलितों की आबादी करीब 19 फीसदी है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, चिराग पासवान को हर चुनाव में औसतन करीब 6 फीसदी वोट मिलता रहा है। खास बात यह है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनका स्ट्राइक रेट 100 फीसदी रहा।

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