कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता पद को लेकर चल रहे राजनीतिक और कानूनी विवाद के बीच गुरुवार को कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने स्पष्ट किया कि फिलहाल विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय ही बने रहेंगे। अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष द्वारा किए गए चयन में अंतरिम स्तर पर कोई हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
यह फैसला ऐसे समय आया है जब राज्य विधानसभा का बजट सत्र शुरू होने जा रहा है। बजट सत्र आरंभ होने से कुछ घंटे पहले आए इस आदेश को राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या है पूरा विवाद?
2026 के विधानसभा चुनाव के बाद विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस के भीतर विपक्ष के नेता के चयन को लेकर मतभेद सामने आए। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने बालीगंज के विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाए जाने का प्रस्ताव रखा था।
हालांकि, एंटाली के विधायक संदीपन साहा ने दावा किया कि 58 विधायकों का समर्थन उलबेड़िया पूर्व के विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के पक्ष में है। इसके आधार पर विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बसु ने ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया। अध्यक्ष के इस निर्णय को चुनौती देते हुए शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हाईकोर्ट का अंतरिम फैसला
पिछले दो दिनों से इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कृष्णा राव की अदालत में चल रही थी। गुरुवार को अदालत ने कहा कि विपक्षी खेमे के विधायकों द्वारा किए गए चयन में फिलहाल कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा। न्यायालय ने शोभनदेव चट्टोपाध्याय की याचिका पर तत्काल कोई अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। हालांकि, अदालत ने मामले को पूरी तरह समाप्त नहीं किया है और अगली सुनवाई की तारीख 28 जुलाई निर्धारित की है।
अध्यक्ष की भूमिका पर उठे थे सवाल
मामले की पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्रनाथ बसु की भूमिका पर भी सवाल उठाए थे। न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने पूछा था, “स्पीकर अपने कक्ष में बैठकर यह कैसे तय कर सकते हैं कि किस पक्ष के पास अधिक विधायक हैं?” यह टिप्पणी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई थी और इससे अध्यक्ष के निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए थे।
जाली हस्ताक्षरों के आरोप ने बढ़ाया विवाद
सुनवाई के दौरान स्पीकर की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि तृणमूल कांग्रेस द्वारा भेजे गए पत्र में विधायक दल की बैठक का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसके बाद अध्यक्ष ने बैठक की कार्यवाही (मिनट्स) और शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता चुनने संबंधी प्रस्ताव की प्रति मांगी। बाद में कुछ तृणमूल विधायकों ने आरोप लगाया कि प्रस्ताव पत्र पर उनके हस्ताक्षर जाली हैं। इन आरोपों के बाद स्पीकर ने जांच के आदेश दिए।
इसी बीच संदीपन साहा ने स्पीकर को एक अलग पत्र सौंपकर दावा किया कि उनके समूह को बहुमत का समर्थन प्राप्त है और विपक्ष के नेता के रूप में ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का चयन किया गया है। अंततः स्पीकर ने इसी दावे को मान्यता देते हुए ऋतब्रत को विपक्ष का नेता घोषित कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद विपक्षी दलों की ओर से विधानसभा अध्यक्ष को एक प्रस्ताव भेजा गया था। इस प्रस्ताव में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को विपक्ष का नेता, असीमा पात्र और नयना बंद्योपाध्याय को उप-विपक्ष नेता तथा फिरहाद हाकिम को मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) बनाने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इसके बाद पार्टी के भीतर असंतुष्ट विधायकों का एक समूह सामने आया, जिसने अलग प्रस्ताव पेश करते हुए ऋतब्रत बंद्योपाध्याय को विपक्ष का नेता बनाने की मांग की। यही प्रस्ताव बाद में अध्यक्ष द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
बजट सत्र से पहले राजनीतिक महत्व
राज्यपाल के अभिभाषण के साथ शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र से पहले हाईकोर्ट के इस आदेश ने विपक्षी राजनीति को नई दिशा दे दी है। अब विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व ऋतब्रत बंद्योपाध्याय ही करेंगे, जबकि शोभनदेव चट्टोपाध्याय की कानूनी लड़ाई फिलहाल जारी रहेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 28 जुलाई को होने वाली अगली सुनवाई इस विवाद की दिशा और राज्य की विपक्षी राजनीति के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।