नई दिल्ली। बंगाल की खाड़ी से एक बेहद दर्दनाक और बड़ी त्रासदी की खबर आ रही है। म्यांमार तट के पास रोहिंग्या शरणार्थियों से खचाखच भरी दो नावें समुद्र में डूब गई हैं। इस भयानक हादसे में 500 से ज्यादा लोगों के डूबकर मरने की आशंका जताई जा रही है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की एजेंसियों ने इस दिल दहला देने वाले हादसे की जानकारी दी है। बताया जा रहा है कि यह भीषण हादसा समुद्र में बेहद खराब मौसम और मानसून की तूफानी लहरों की वजह से हुआ है। हादसे को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) ने एक संयुक्त बयान (Joint Statement) जारी किया है। इस साझा बयान के अनुसार, जून के आखिरी हफ्ते में म्यांमार के पश्चिमी रखाइन राज्य से 500 से ज्यादा रोहिंग्या शरणार्थी दो नावों में सवार होकर रवाना हुए थे। इनमें से एक नाव में लगभग 250 और दूसरी नाव में करीब 300 लोग भेड़-बकरियों की तरह ठूस-ठूस कर भरे हुए थे। रखाइन तट छोड़ने के कुछ समय बाद ही दोनों नावें लापता हो गईं। आशंका है कि यह दोनों नावें गत 8 जुलाई को बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के इरावदी तट के पास डूब गईं और उनमें सवार सभी लोग गहरे समंदर में समा गए।
न मिले शव, न जिंदा होने का कोई सुराग
संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक, इस हादसे में जान गंवाने वाले लोगों की संख्या की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है। लेकिन सबसे दुखद बात यह है कि लापता हुए लोगों का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है। समंदर की उफनती लहरों के बीच से अब तक न तो किसी का शव बरामद हुआ है और न ही किसी के जिंदा बचने की कोई खबर आई है। आमतौर पर रोहिंग्या समुदाय के लोग मानसून के इस मौसम में समुद्र के रास्ते सफर करने से बचते हैं। इसका कारण यह है कि मानसून के दौरान बंगाल की खाड़ी में मौसम बेहद मिजाजी और खतरनाक हो जाता है। समुद्र में कई मीटर ऊंची लहरें उठती हैं, जिससे छोटी और कमजोर नावों के पलटने का खतरा हमेशा बना रहता है। लेकिन इस बार मजबूरी और बदहाली ने इन्हें मौत के सफर पर जाने के लिए विवश कर दिया।
आखिर क्यों जान जोखिम में डालने को मजबूर हुए रोहिंग्या?
संयुक्त राष्ट्र (UN) की रिपोर्ट के अनुसार, म्यांमार में लगातार जारी हिंसा और उत्पीड़न के कारण रोहिंग्या शरणार्थियों के पास कोई रास्ता नहीं बचा है। वहीं दूसरी ओर, पड़ोसी देश बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों (Refugee Camps) में भीड़ अपनी चरम सीमा पर पहुंच चुकी है। इन कैंपों में बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है और रहने के हालात बद से बदतर हो चुके हैं।
यही वजह है कि ये लाचार लोग अपनी और अपने बच्चों की जान जोखिम में डालकर गहरे समंदर के रास्ते पलायन कर रहे हैं। इस हादसे का शिकार हुए लोगों में म्यांमार के रखाइन के निवासियों के साथ-साथ बांग्लादेश के शरणार्थी कैंपों से भागे रोहिंग्या भी शामिल थे। ये सभी लोग समुद्र के रास्ते मलेशिया, इंडोनेशिया या थाईलैंड पहुंचकर अपने लिए एक नई और सुरक्षित जिंदगी शुरू करना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था और मंजिल पर पहुंचने से पहले ही मौत ने इन्हें अपनी आगोश में ले लिया।