टी20 विश्व कप जीतने के बाद जिस भारतीय टीम से अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दबदबे की उम्मीद थी, वह नए चक्र (New Cycle) की शुरुआत में ही बिखरती नजर आ रही है। पहले आयरलैंड और अब इंग्लैंड के हाथों टी20 सीरीज गंवाकर टीम इंडिया बैकफुट पर है। ब्रिस्टल में मिली हार के साथ भारत ने पिछले 6 मैचों में अपनी 5वीं हार झेली है, जिससे 2018-19 के बाद पहली बार टीम को लगातार दो टी20 सीरीज में शिकस्त का सामना करना पड़ा। इंग्लैंड ने भारत को ट्रेंट ब्रिज में महज 76 रन पर समेट दिया (जो भारत का दूसरा सबसे छोटा टी20 स्कोर है), तो वहीं ब्रिस्टल में 159 रन के लक्ष्य को सिर्फ 13.5 ओवर में हासिल कर लिया। विश्व चैंपियन बनने के कुछ ही महीनों बाद टीम इंडिया के इस पतन की 8 सबसे बड़ी वजहें इस प्रकार हैं:
परिस्थितियों का गलत आकलन और खराब ढराव
भारतीय बल्लेबाज आयरलैंड और इंग्लैंड की तेज, सीम और स्विंग लेती पिचों के अनुसार अपनी रणनीति नहीं बदल सके।
- आयरलैंड में: पिच और हवा से गेंदबाजों को मदद मिल रही थी, लेकिन भारतीय बल्लेबाज विकेट बचाने के बजाय लगातार बड़े शॉट खेलने के चक्कर में आउट होते रहे। खुद कप्तान श्रेयस अय्यर ने माना कि टीम मैदान के आकार और हालात के लिए तैयार नहीं थी।
- इंग्लैंड में: यहां टीम ने बिल्कुल उल्टा किया। आक्रामक गेंदबाजी के सामने बल्लेबाज जरूरत से ज्यादा डिफेंसिव हो गए, जबकि यह बल्लेबाजी क्रम कभी भी रक्षात्मक खेल के लिए तैयार ही नहीं किया गया था।
अस्थिर टीम चयन और बल्लेबाजी क्रम से छेड़छाड़
सीरीज के दौरान लगातार टीम संयोजन बदला गया, जिससे खिलाड़ी अपनी भूमिका को लेकर असमंजस में रहे।
- नंबर-3 पर दो टी20 अंतरराष्ट्रीय शतक लगाने वाले तिलक वर्मा को नंबर-6 जैसे निचले क्रम पर भेजा गया, जहां पहली गेंद से हिट करना उनकी स्वाभाविक शैली नहीं है।
- शिवम दुबे की भूमिका पूरे दौरे में धुंधली रही; उन्हें कभी फिनिशर तो कभी शुरुआती दबाव झेलने वाला बल्लेबाज बनाया गया। श्रेयस अय्यर को छोड़कर लगभग हर बल्लेबाज इंग्लैंड के चक्रव्यूह में फंस गया।
गेंदबाजी आक्रमण में निरंतरता की कमी
टीम प्रबंधन ने लगभग हर मुकाबले में अपनी गेंदबाजी इकाई को बदला। विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार बदलाव के कारण गेंदबाजों को अपनी भूमिका स्पष्ट करने और लय हासिल करने का मौका ही नहीं मिला, जिसका इंग्लैंड के बल्लेबाजों ने जमकर फायदा उठाया।
घरेलू ‘सपाट पिचों’ पर खेलने की आदत
भारतीय खिलाड़ी पिछले काफी समय से घरेलू मैदानों और आईपीएल की सपाट पिचों पर खेल रहे थे। जैसे ही उन्हें अचानक सीम और बाउंस वाली विदेशी पिचों पर जाना पड़ा, टीम की तकनीकी कमियां उजागर हो गईं। साल 2028 में दक्षिण अफ्रीका में टी20 विश्व कप होना है, ऐसे में सपाट पिचों पर की जा रही यह तैयारी बीसीसीआई की रणनीति पर बड़े सवाल खड़े करती है।
विश्व कप वाली लय और कप्तानी का असमंजस
2022 के बाद भारत ने रोहित शर्मा की कप्तानी में एक मजबूत बेस तैयार किया था जिससे विश्व कप में जीत मिली। लेकिन 2026 की खिताबी जीत के बाद अचानक कप्तान बदल दिया गया। आईपीएल के बाद एक ऐसे खिलाड़ी को कप्तानी सौंप दी गई जिसने तीन साल से टी20 अंतरराष्ट्रीय नहीं खेला था, जबकि लगातार दो बार आईपीएल खिताब जीतने वाले रजत पाटीदार जैसे खिलाड़ियों को स्क्वाड में जगह तक नहीं मिल पा रही है।
बाएं हाथ के बल्लेबाजों (Left-handers) पर अति-निर्भरता
टीम प्रबंधन ने ‘राइट-लेफ्ट कॉम्बिनेशन’ के चक्कर में जरूरत से ज्यादा बाएं हाथ के बल्लेबाजों को प्लेइंग-11 में भर दिया। श्रेयस अय्यर को छोड़ दें तो वैभव, अभिषेक, ईशान, दुबे, तिलक, सुंदर और अक्षर… सभी बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। इस असंतुलन के कारण कई खिलाड़ियों को उनकी स्वाभाविक पोजीशन पर खेलने का मौका नहीं मिला।
. वॉशिंगटन सुंदर के फॉर्म पर उठते सवाल
इंग्लैंड जैसे हालातों में एक अतिरिक्त विशेषज्ञ बल्लेबाज या तेज गेंदबाज की जगह वॉशिंगटन सुंदर को लगातार खिलाने पर विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं। सुंदर ने अपने टी20 करियर के 62 मैचों में केवल 15.5 की औसत से 279 रन बनाए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 1 जनवरी 2026 से खेले 4 मैचों में उनके नाम एक भी विकेट नहीं है।
मुख्य कोच गौतम गंभीर की रणनीतिक विफलता?
एक मुख्य कोच के रूप में खिलाड़ियों को विदेशी परिस्थितियों के लिए मानसिक और तकनीकी रूप से तैयार करना गौतम गंभीर की जिम्मेदारी थी, जिसमें वह विफल रहे।
- बल्लेबाज मुश्किल स्पेल में स्ट्राइक रोटेट करने के बजाय गैर-जिम्मेदाराना शॉट खेलते दिखे।
- ब्रिस्टल में इंग्लैंड के बल्लेबाजों (जैसे हैरी ब्रुक) ने मैदान की छोटी सीधी बाउंड्री का बखूबी इस्तेमाल किया, लेकिन भारतीय बल्लेबाज दिशा तक तय नहीं कर पा रहे थे।
- अतीत में (2014 में) ज्योफ्री बॉयकॉट ने इंग्लैंड की पिचों पर गंभीर की तकनीक को ‘बेकार’ कहा था। अब 12 साल बाद बतौर कोच गंभीर की रणनीतियों पर भी वही सवाल उठने लगे हैं। अनिल कुंबले और वरुण एरॉन जैसे पूर्व दिग्गजों ने भी इस स्थापित टीम मैनेजमेंट की स्पष्ट सोच की कमी पर चिंता जताई है।
कप्तान श्रेयस अय्यर का पक्ष: “यह टीम फिलहाल बदलाव के दौर (Transition Phase) से गुजर रही है। हमें थोड़ा धैर्य रखने की जरूरत है। मुझे पूरा भरोसा है कि आने वाले समय में सब कुछ सही दिशा में आगे बढ़ेगा।”
बदलाव का दौर अपनी जगह है, लेकिन अगर टीम इंडिया को विदेशी पिचों पर अपनी साख बचानी है, तो उसे अपनी चयन नीति, कप्तानी के स्पष्ट विकल्प और परिस्थितियों के अनुसार खेलने के ढर्रे में तुरंत सुधार करना होगा।