नई दिल्ली। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व कृष्ण जन्माष्टमी आज, 4 सितंबर को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व को लेकर देशभर के मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं। भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं का मंचन, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी।धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसी वजह से जन्माष्टमी की पूजा में रात के समय होने वाले निशिता काल का विशेष महत्व माना जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखने के बाद मध्यरात्रि में कान्हा का जन्मोत्सव मनाते हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं।
रात 11:57 से 12:43 बजे तक निशिता पूजा मुहूर्त
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए निशिता काल को विशेष माना गया है। दी गई जानकारी के अनुसार, आज निशिता पूजा का समय रात 11 बजकर 57 मिनट से शुरू होकर 12 बजकर 43 मिनट तक रहेगा। यानी भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के लिए करीब 45 मिनट का समय मिलेगा। इस दौरान बाल गोपाल का अभिषेक, श्रृंगार, पूजन और आरती की जा सकती है।
ऐसे करें भगवान श्रीकृष्ण की पूजा
मध्यरात्रि में पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को स्वच्छ करके भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा या लड्डू गोपाल को स्थापित करें। इसके बाद विधि के अनुसार पूजा करें।
पूजा की आसान विधि
- सबसे पहले बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक करें।
- इसके बाद गंगाजल से भगवान को स्नान कराएं।
- भगवान श्रीकृष्ण को नए वस्त्र पहनाएं।
- मुकुट और आभूषणों से उनका श्रृंगार करें।
- रोली, अक्षत और चंदन अर्पित करें।
- भगवान को माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी, पंचमेवा और खीर का भोग लगाएं।
- पूजा में तुलसी दल अर्पित करें।
- इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें।
- अंत में पूजा में हुई किसी भी त्रुटि के लिए भगवान से क्षमा प्रार्थना करें।
व्रत खोलते समय सबसे पहले क्या खाएं?
जन्माष्टमी का व्रत रखने वाले भक्तों के लिए पारण यानी व्रत खोलने का समय और तरीका भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कई परंपराओं में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म और मध्यरात्रि की पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलने की मान्यता है। वहीं कुछ लोग अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण करते हैं। व्रत खोलते समय सबसे पहले भगवान को अर्पित किया गया प्रसाद ग्रहण करना शुभ माना जाता है। पारण की शुरुआत चरणामृत, माखन-मिश्री, धनिये की पंजीरी या फल से की जा सकती है। इसके बाद अपनी परंपरा और व्रत के नियमों के अनुसार भोजन ग्रहण किया जाता है।
ध्यान रखें: जन्माष्टमी के पारण की परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में अलग हो सकती है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग या परिवार की धार्मिक परंपरा के अनुसार पारण का समय और भोजन तय करना उचित है।
जन्माष्टमी की रात ही क्यों मनाया जाता है कृष्ण जन्मोत्सव?
धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में हुआ था। इसी कारण जन्माष्टमी की रात को भगवान के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। मध्यरात्रि में मंदिरों और घरों में विशेष पूजा होती है। बाल गोपाल का अभिषेक कर उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं। इसके बाद उन्हें माखन-मिश्री, पंजीरी, फल और अन्य प्रसाद का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर भगवान के जन्म के बाद झूला झुलाने और आरती करने की भी परंपरा है।
जन्माष्टमी पर इन मंत्रों का करें जाप
भगवान श्रीकृष्ण की पूजा के दौरान भक्त श्रद्धा के साथ उनके मंत्रों का जाप करते हैं। जन्माष्टमी पर इन मंत्रों का जाप किया जा सकता है:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने।
प्रणतक्लेशनाशाय गोविंदाय नमो नमः॥
ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे
वासुदेवाय धीमहि
तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्॥
ॐ क्लीं कृष्णाय नमः।
ॐ कृष्णाय नमः।
ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा॥
इन मंत्रों का जाप श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं में मंत्र जाप को भगवान श्रीकृष्ण की आराधना का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।
मंदिरों में दिखेगा जन्माष्टमी का उत्साह
जन्माष्टमी के अवसर पर देशभर के कृष्ण मंदिरों में विशेष आयोजन किए जाते हैं। मंदिरों को फूलों और रोशनी से सजाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित झांकियां सजाई जाती हैं और कई जगहों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। रात होते ही भक्त भगवान के जन्म का इंतजार करते हैं। मध्यरात्रि में जन्मोत्सव के साथ मंदिरों में घंटियां और शंखनाद गूंज उठते हैं। इसके बाद भगवान की आरती और प्रसाद वितरण किया जाता है।
श्रद्धा और उल्लास का पर्व है जन्माष्टमी
कृष्ण जन्माष्टमी केवल व्रत और पूजा का पर्व ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन, उनके संदेश और उनकी शिक्षाओं को याद करने का अवसर भी है। भक्त इस दिन श्रद्धा के साथ भगवान का स्मरण करते हैं और सुख-शांति की कामना करते हैं।
डिस्क्लेमर: इस खबर में दी गई पूजा विधि, व्रत-पारण और धार्मिक मान्यताएं विभिन्न परंपराओं और मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग क्षेत्रों, पंचांगों और परिवारों में पूजा तथा पारण की विधि और समय में अंतर हो सकता है। किसी विशेष धार्मिक अनुष्ठान के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान की सलाह लेना उचित है।