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कौन थे नरेंद्र मोदी के गुरु लक्ष्मणराव इनामदार? वडनगर से शुरू हुआ रिश्ता, अहमदाबाद की पाठशाला ने गढ़ा नेतृत्व

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। संघ के साथ उनके शुरुआती जुड़ाव ने उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली को दिशा दी। इसी दौर में उनका संपर्क. . .

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन और राजनीतिक यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। संघ के साथ उनके शुरुआती जुड़ाव ने उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली को दिशा दी। इसी दौर में उनका संपर्क लक्ष्मणराव इनामदार से हुआ, जिन्हें नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शक और गुरु के तौर पर याद किया जाता है। संघ में इनामदार को लोग स्नेह से ‘वकील साहब’ कहकर बुलाते थे।

वडनगर में हुई पहली मुलाकात

नरेंद्र मोदी का संघ से संपर्क किशोरावस्था में गुजरात के वडनगर में हुआ। उस समय वह अपने पिता की चाय की दुकान पर हाथ बंटाने के साथ आरएसएस की शाखा में भी जाते थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात गुजरात के तत्कालीन प्रांत प्रचारक लक्ष्मणराव इनामदार से हुई। इनामदार के व्यक्तित्व, अनुशासन और राष्ट्रसेवा के विचारों ने युवा नरेंद्र मोदी को प्रभावित किया। बताया जाता है कि उन्होंने मोदी के भीतर मौजूद संगठन क्षमता और नेतृत्व के गुणों को शुरुआती दौर में ही पहचान लिया था।

हिमालय से लौटे तो गुरु ने दिखाई नई राह

किशोरावस्था के बाद नरेंद्र मोदी आध्यात्मिक जीवन की तलाश में घर से निकल गए। वर्ष 1969 के आसपास उन्होंने हिमालय, बेलूर मठ और देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थित आश्रमों का भ्रमण किया। करीब दो वर्ष बाद जब वह गुजरात लौटे, तो उनके सामने भविष्य को लेकर कई सवाल थे। अहमदाबाद पहुंचने पर लक्ष्मणराव इनामदार ने उन्हें संघ कार्यालय हेडगेवार भवन में रहने की व्यवस्था कराई। यहीं से मोदी के जीवन का एक नया अध्याय शुरू हुआ। इनामदार ने उन्हें संगठन के कामकाज से जोड़ा और उनकी क्षमताओं को निखारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चाय बनाने और सफाई से लेकर संगठन निर्माण तक

हेडगेवार भवन में नरेंद्र मोदी ने संघ के सामान्य कार्यकर्ता की तरह काम किया। चाय बनाना, साफ-सफाई करना और कार्यालय के रोजमर्रा के कामों में सहयोग करने के साथ वह संगठन की गतिविधियों में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते थे।इनामदार के मार्गदर्शन में उन्होंने संगठन निर्माण, अनुशासन और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की बारीकियां सीखीं। धीरे-धीरे वह गुजरात में संघ के युवा कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उनके लिए यह दौर किसी प्रशिक्षण संस्थान से कम नहीं था।

नेतृत्व और भाषण की शैली को भी मिला मार्गदर्शन

लक्ष्मणराव इनामदार ने नरेंद्र मोदी की संगठन क्षमता को पहचानने के साथ उनकी नेतृत्व शैली को भी दिशा दी। उनके मार्गदर्शन में मोदी ने लोगों के बीच संवाद करने, कार्यकर्ताओं को जोड़ने और संगठन के लिए लगातार काम करने की शैली विकसित की। इनामदार का जोर सादगी, अनुशासन और संगठन के प्रति पूर्ण समर्पण पर था। यही गुण आगे चलकर नरेंद्र मोदी की कार्यशैली का हिस्सा बने।

कौन थे लक्ष्मणराव इनामदार?

लक्ष्मणराव इनामदार का जन्म 1917 में महाराष्ट्र के पुणे के निकट खाटव गांव में हुआ था। उनके पिता राजस्व विभाग में अधिकारी थे। परिवार में कई भाई-बहनों के बीच पले-बढ़े इनामदार ने कानून की शिक्षा हासिल की और बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में भी सक्रिय भूमिका निभाई। इसके अलावा हैदराबाद के निजाम के खिलाफ चले आंदोलन में भी उनकी भागीदारी रही। संघ के प्रचारक के रूप में उन्होंने अपना जीवन संगठन और समाजसेवा को समर्पित कर दिया तथा अविवाहित रहने का संकल्प निभाया।

सादगी भरी जिंदगी का मोदी पर असर

इनामदार सामान्यतः सफेद धोती-कुर्ता पहनते थे। उन्हें किताबें पढ़ने और देश-दुनिया की घटनाओं की जानकारी रखने में विशेष रुचि थी। संघ की शाखाओं में नरेंद्र मोदी अन्य स्वयंसेवकों के साथ कबड्डी, खो-खो, योग और प्राणायाम जैसी गतिविधियों में भी हिस्सा लेते थे। इनामदार की सादगी और संगठन के प्रति समर्पण ने युवा मोदी पर गहरा प्रभाव डाला। वर्षों तक संघ में काम करने के बाद 1972 में नरेंद्र मोदी को प्रचारक की जिम्मेदारी दी गई।

आपातकाल में भूमिगत होकर किया संगठन का काम

1975 में देश में आपातकाल लागू होने के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया और कई संघ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। इस दौरान नरेंद्र मोदी और लक्ष्मणराव इनामदार भी भूमिगत होकर संगठन से जुड़े कार्यों को आगे बढ़ाते रहे। इस दौर में मोदी ने अलग-अलग वेशभूषा अपनाकर अपनी पहचान छिपाई और संघ कार्यकर्ताओं के संपर्क में रहकर संगठनात्मक गतिविधियों को जारी रखा। आपातकाल के बाद उनकी संगठनात्मक क्षमता के चलते उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियां मिलती गईं।

गुरु के निधन के बाद भी यादों को संजोए रखा

लक्ष्मणराव इनामदार को जीवन के अंतिम दौर में कैंसर की बीमारी का सामना करना पड़ा। वर्ष 1984 में उनका निधन हो गया। हालांकि, उनके निधन के बाद भी नरेंद्र मोदी ने अपने गुरु की स्मृतियों और उनकी लिखी पुस्तकों को संजोकर रखा।\ मोदी के जीवन में इनामदार का प्रभाव केवल संघ के प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा। उन्हें एक ऐसे मार्गदर्शक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने युवा नरेंद्र मोदी की संगठन क्षमता और नेतृत्व को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जिस जगह किताब का विमोचन हुआ, वहीं 13 साल बाद पहुंचे पीएम बनकर

नरेंद्र मोदी और लक्ष्मणराव इनामदार के रिश्ते से जुड़ा एक प्रसंग खास तौर पर उल्लेखनीय है। 18 अगस्त 2001 को नरेंद्र मोदी तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री आवास पहुंचे थे। उस समय मोदी भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर दिल्ली में सक्रिय थे और अपने गुरु लक्ष्मणराव इनामदार की पुस्तक के विमोचन से जुड़े कार्यक्रम के सिलसिले में वहां पहुंचे थे। इसके करीब 13 साल बाद वही प्रधानमंत्री आवास नरेंद्र मोदी के लिए एक नए रूप में सामने आया। वर्ष 2014 में नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर इसी पद और जिम्मेदारी तक पहुंचे। इस तरह उनके राजनीतिक सफर में गुरु लक्ष्मणराव इनामदार की भूमिका का अध्याय भी उनकी जीवन यात्रा से गहराई से जुड़ा रहा।

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