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भारत का नया ‘सुरक्षा कवच’ तैयार : अब आसमान से दुश्मन का बचना मुश्किल! 400 किमी दूर ही दुश्मन के हर हवाई खतरे का करेगा खात्मा ‘कुश’

नई दिल्ली। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली ‘कुश’ (Kusha) मिसाइल प्रणाली का पहला सफल उड़ान परीक्षण ओडिशा तट पर स्थित डॉ. एपीजे. अब्दुल कलाम द्वीप से किया. . .

नई दिल्ली। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) द्वारा विकसित लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली ‘कुश’ (Kusha) मिसाइल प्रणाली का पहला सफल उड़ान परीक्षण ओडिशा तट पर स्थित डॉ. एपीजे. अब्दुल कलाम द्वीप से किया गया। परीक्षण के दौरान मिसाइल के सभी प्रमुख मानकों का सफलतापूर्वक मूल्यांकन किया गया और प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार इसका प्रदर्शन निर्धारित मानकों के अनुरूप रहा। इस उपलब्धि पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ, सशस्त्र बलों तथा परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को बधाई दी।

कुश मिसाइल प्रणाली क्या है?

‘कुश’ भारत का स्वदेशी और अत्याधुनिक लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल (LRSAM) एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे देश की हवाई सुरक्षा को मजबूत बनाने और लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों को समय रहते नष्ट करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

मारक क्षमता और विशेषताएं

  • अधिकतम 400 किलोमीटर तक हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने की क्षमता।
  • लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, बैलिस्टिक मिसाइल, ड्रोन, स्टील्थ एयरक्राफ्ट और बड़े सैन्य विमानों को इंटरसेप्ट करने में सक्षम।
  • विभिन्न ऊंचाइयों पर मौजूद लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से नष्ट कर सकता है।
  • एडवांस AESA रडार की मदद से एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक और इंटरसेप्ट करने की क्षमता।

कुश मिसाइल का मुख्य उद्देश्य

इस प्रणाली का प्रमुख लक्ष्य भारत के महत्वपूर्ण शहरों, परमाणु संयंत्रों, सैन्य ठिकानों और रणनीतिक बुनियादी ढांचों के ऊपर एक मजबूत हवाई सुरक्षा कवच तैयार करना है, ताकि दुश्मन के हवाई हमलों को लक्ष्य तक पहुंचने से पहले ही विफल किया जा सके।

S-400 पर निर्भरता होगी कम

वर्तमान में भारत लंबी दूरी की वायु रक्षा के लिए रूस से प्राप्त S-400 प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर है। ‘कुश’ के पूर्ण रूप से विकसित होने के बाद विदेशी रक्षा प्रणालियों पर निर्भरता कम होगी, जिससे:

  • रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
  • अरबों डॉलर की विदेशी खरीद में बचत होगी।
  • स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा।

युद्ध के दौरान हाई-वैल्यू टारगेट पर प्रहार

‘कुश’ प्रणाली दुश्मन के महत्वपूर्ण हवाई संसाधनों को भी निशाना बना सकती है, जिनमें शामिल हैं:

  • AWACS (हवाई चेतावनी एवं नियंत्रण विमान)
  • हवा में ईंधन भरने वाले टैंकर विमान
  • स्टील्थ फाइटर जेट्स

इन लक्ष्यों को सीमा से काफी दूर ही नष्ट कर दुश्मन की हवाई क्षमता को कमजोर किया जा सकता है।

भारत की सैन्य क्षमता को कैसे मजबूत करेगी?

1. तीन-स्तरीय वायु सुरक्षा कवच

भारत की वायु रक्षा प्रणाली को तीन स्तरों में और अधिक मजबूत बनाया जाएगा:

  • आकाश – छोटी दूरी की सुरक्षा
  • MRSAM – मध्यम दूरी की सुरक्षा
  • कुश – लंबी दूरी (400 किमी तक) की सुरक्षा

ये तीनों मिलकर देश के हवाई क्षेत्र को बहुस्तरीय सुरक्षा प्रदान करेंगे।

2. एक साथ कई खतरों का सामना

एडवांस AESA रडार एक ही समय में कई मिसाइलों, लड़ाकू विमानों और ड्रोन को ट्रैक कर उन पर सटीक कार्रवाई कर सकता है।

3. चीन और पाकिस्तान के खिलाफ रणनीतिक बढ़त

विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रणाली के तैनात होने के बाद चीन और पाकिस्तान के लड़ाकू विमान तथा मिसाइलों के लिए भारतीय हवाई क्षेत्र के करीब आना अधिक जोखिमपूर्ण हो जाएगा। इससे भारत की प्रतिरोधक (Deterrence) क्षमता मजबूत होगी।

4. नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर

‘कुश’ प्रणाली भारतीय वायु सेना के IACCS (Integrated Air Command and Control System) से जुड़कर काम करेगी। इससे:

  • रडार से लक्ष्य की पहचान,
  • ट्रैकिंग,
  • और मिसाइल प्रक्षेपण

जैसी पूरी प्रक्रिया तेज, समन्वित और अधिक प्रभावी होगी।

रक्षा विशेषज्ञों की राय

रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘कुश’ का सफल परीक्षण भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इतनी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली स्वदेशी प्रणाली विकसित करने की क्षमता दुनिया के केवल कुछ चुनिंदा देशों के पास है। यह परियोजना भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने और अत्याधुनिक वायु रक्षा तकनीक विकसित करने की दिशा में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

भारत की वायु रक्षा क्षमता को नई ऊंचाई

‘कुश’ मिसाइल प्रणाली भारत की वायु रक्षा क्षमता को नई ऊंचाई देने वाली परियोजना है। इसके सफल विकास और भविष्य में तैनाती से देश को लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने, महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक परिसंपत्तियों की सुरक्षा मजबूत करने तथा विदेशी एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण मदद मिलेगी। यह भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति और आधुनिक सैन्य क्षमता को और अधिक सशक्त बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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