मुंबई। भारतीय सिनेमा में इन दिनों मिडिल क्लास परिवारों की खट्टी-मीठी जिंदगी पर बनी ‘स्लाइस ऑफ लाइफ’ फिल्मों का अलग ही जलवा है। इसी कड़ी में एक नई और मजेदार एंट्री हुई है—‘उत्तर दा पुत्तर’। आमतौर पर अंधविश्वास और साइंस की लड़ाई को फिल्मों में बहुत भारी-भरकम ज्ञान के साथ दिखाया जाता है, जिससे दिमाग का दही हो जाता है। लेकिन निर्देशक रविंदर सिवाच, निर्माता संदीप कपूर और प्रिया कपूर ने इस गंभीर मुद्दे को ऐसा ‘हास्य का तड़का’ लगाकर परोसा है कि आप पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर हो जाएंगे।
प्रोफेसर साहब का लोचा: न्यूटन के नियम पढ़ाते हैं, खुद काले कपड़ों का टोटका आजमाते हैं!
फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी इसका लीड कैरेक्टर है—प्रोफेसर साई राम टुटेजा। पेशे से यह जनाब फिजिक्स के टीचर हैं, जो क्लास में न्यूटन के लॉ पढ़ाते हैं, लेकिन खुद की पर्सनल लाइफ में तंत्र-मंत्र, टोटके और वास्तु शास्त्र के भंवरजाल में फंसे हुए हैं! कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब प्रोफेसर साहब अपनी जिंदगी से सारी ‘नेगेटिव एनर्जी’ भगाने के लिए एक 100% वास्तु-सम्मत परफेक्ट घर खरीदते हैं। वह बड़े गर्व से अपने ससुर और साले को घर की दिशाएं दिखा रहे होते हैं, तभी छत का पुराना पंखा सीधा उनके ससुरजी और साले पर गिर जाता है इस ‘वास्तु धमाके’ के बाद उनकी पत्नी गिन्नी (रुखसार रहमान) गुस्सा होकर मायके चली जाती हैं। बस फिर क्या, प्रोफेसर साहब अपने पक्के यार मन्नू (बृजेंद्र काला) को साथ लेकर पत्नी को वापस लाने और एक ‘अल्ट्रा-परफेक्ट वास्तु वाले घर’ की तलाश में दिल्ली की सड़कों पर निकल पड़ते हैं।
जब अन्नू कपूर और पवन मल्होत्रा ने महफिल लूटी
यह पूरी तरह से कलाकारों के कंधे पर टिकी फिल्म है:
- अन्नू कपूर (प्रोफेसर टुटेजा): अंधविश्वास के पिंजरे में कैद इंसान के डर, घबराहट और सनक को अन्नू कपूर ने जिस अंदाज में जीया है, वह सिर्फ वही कर सकते थे। उनके चेहरे के एक्सप्रेशन ही आधी कॉमेडी कर देते हैं।
- पवन मल्होत्रा (नेक चड्ढा): स्क्रीन पर आते ही पूरी फिल्म में अलग ही एनर्जी भर देते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है।
- बृजेंद्र काला (दोस्त मन्नू): अपने देसी वन-लाइनर्स और ठेठ लहजे से हर सीन में जान डालते हैं।
- सपोर्टिंग ब्रिगेड: इश्तियाक खान (वास्तुकार वर्मा) और जीवेशु अहलूवालिया (एसबी सिद्धू) ने अपनी छोटी भूमिकाओं में भी दर्शकों को लोटपोट कर दिया है।
बिना फूहड़ता के परोसा ठेठ दिल्ली का जायका
बतौर डायरेक्टर रविंदर सिवाच की यह पहली फिल्म है, लेकिन उन्होंने जिस सफाई से दिल्ली की तंग गलियों, मध्यवर्गीय सोच और ड्रामा को संभाला है, वह काबिल-ए-तारीफ है। 1 घंटा 43 मिनट की यह फिल्म बिना किसी घटिया या फूहड़ जोक्स के, परिवार के साथ बैठकर देखने लायक एक साफ-सुथरी कॉमेडी है। बैकग्राउंड स्कोर और चुटीले डायलॉग्स फिल्म की रफ्तार को बनाए रखते हैं।
कहाँ ढीली पड़ गई पकड़? (थोड़ी सी कमियां)
फिल्म का पहला हाफ जितना धमाकेदार है, सेकंड हाफ में क्लाइमैक्स से ठीक पहले कहानी थोड़ी सी खिंचती हुई लगती है। बार-बार वास्तु की तलाश में भागदौड़ का सीन थोड़ा रिपीटेड महसूस होता है। साथ ही, अंत में ज्ञान/संदेश देने की हड़बड़ी में फिल्म थोड़ी सी मेलोड्रामैटिक हो जाती है, जो शुरुआत के हल्के-फुल्की टोन से थोड़ा भटकती है।
अंतिम फैसला: देखें या न देखें?
‘उत्तर दा पुत्तर’ तनाव भरी जिंदगी में ताजी हवा के झोंके जैसी है। यह सिर्फ बेसिर-पैर के चुटकुलों का डिब्बा नहीं है, बल्कि एक प्यारा सा सवाल पूछती है—क्या जिंदगी कर्मों से चलती है या घर की दिशाओं और टोटकों से? अगर आप इस वीकेंड अपने परिवार के साथ हंसने-हंसाने और मूड फ्रेश करने का मन बना रहे हैं, तो अन्नू कपूर और पवन मल्होत्रा की इस जुगलबंदी का टिकट जरूर कटा लीजिए!