नई दिल्ली। वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद विवाद, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह भूमि विवाद और उत्तर प्रदेश के संभल जामा मस्जिद विवाद में एक नया मोड़ आया है। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रस्तावित आपसी सहमति से विवाद समाधान प्रक्रिया (मध्यस्थता) में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है।दोनों पक्षों का स्पष्ट कहना है कि इन मामलों का निपटारा केवल अदालत में कानूनी आधार पर ही होना चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा किसी एक जगह का नहीं बल्कि पूरे समुदाय की आस्था और अधिकारों से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट का ‘समाधान समारोह-2026’ प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में इन तीनों मामलों के सभी पक्षकारों को पत्र भेजकर “सुप्रीम कोर्ट एक्शन फॉर मेडिएटेड एडजुडिकेशन एंड डिस्प्यूट्स हार्मोनाइजेशन अक्रॉस नेशन (समाधान समारोह-2026)” के तहत समझौते के जरिए समाधान तलाशने का प्रस्ताव दिया था। इस पहल की घोषणा इसी साल अप्रैल में की गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य लंबित मामलों का स्वैच्छिक और सहमति आधारित समाधान कराना है। इसके लिए एक ऑनलाइन पोर्टल और केंद्रीय समन्वय तंत्र भी स्थाzzzzzzzपित किया गया है।zz
विशेष लोक अदालत में शामिल होने से इनकार
इस मध्यस्थता पहल का समापन 21 से 23 अगस्त के बीच आयोजित होने वाली विशेष लोक अदालत में होना तय हुआ था। हालांकि, हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं और तीनों मस्जिदों की प्रबंधन समितियों ने सुप्रीम कोर्ट तथा संबंधित राज्य एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरणों को सूचित कर दिया है कि वे इस मध्यस्थता प्रक्रिया में भाग लेने के इच्छुक नहीं हैं।
मध्यस्थता न करने के मुख्य कारण
मामलों से जुड़े वकीलों और पक्षकारों ने लोक अदालत या आपसी मध्यस्थता से हटने के पीछे निम्नलिखित तर्क दिए हैं:
- व्यापक जनहित और संवेदनशीलता: पूजा स्थलों पर स्वामित्व, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़े ऐसे मामलों का फैसला लोक अदालत या आपसी समझौते के माध्यम से नहीं किया जा सकता।
- कानूनी स्पष्टता की मांग: दोनों पक्षों का मानना है कि इन विवादों का स्थायी समाधान केवल अदालत द्वारा पूरी कानूनी प्रक्रिया के तहत ही संभव है।
- मस्जिद कमेटियों का रुख: मस्जिद प्रबंधन समितियों के प्रतिनिधियों ने कहा कि वे विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के पक्षधर हैं, लेकिन इन मामलों को मध्यस्थता के लिए भेजने के पक्ष में नहीं हैं।
अब सुप्रीम कोर्ट के पाले में गेंद
सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्षों के इस कड़े रुख के बाद अब इन बहुचर्चित मामलों के अगस्त में होने वाली विशेष लोक अदालत में शामिल होने की संभावना लगभग समाप्त हो गई है। इन तीनों विवादों में व्यापक कानूनी और संवैधानिक प्रश्न शामिल हैं, जिनमें पूजा स्थल अधिनियम (Places of Worship Act), 1991 की व्याख्या और उसके दायरे से जुड़े अहम मुद्दे भी शामिल हैं। ऐसे में अब इन मामलों पर अंतिम फैसला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर निर्भर करता है।