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पश्चिम बंगाल के ‘गुंडा दमन कानून’ को चुनौती : कलकत्ता हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार के हालिया ‘गुंडा दमन कानून’ को लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस कानून की वैधता को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है,. . .

कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार के हालिया ‘गुंडा दमन कानून’ को लेकर कानूनी और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इस कानून की वैधता को चुनौती देते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें कानून पर तुरंत रोक (स्थगन) लगाने की मांग की गई है। इस याचिका के बाद राज्य के राजनीतिक और कानूनी हलकों में नई बहस छिड़ गई है।

हाईकोर्ट में याचिका और कानूनी गुहार

पश्चिम बंगाल लोक सुरक्षा और असामाजिक गतिविधि नियंत्रण अधिनियम (West Bengal Public Safety and Control of Anti-Social Activities Act) के खिलाफ वरिष्ठ वकील सब्यसाची चटर्जी ने हाईकोर्ट का रुख किया है। उन्होंने इस कानून के क्रियान्वयन पर रोक लगाने की मांग करते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थसारथी चटर्जी की खंडपीठ (डिवीजन बेंच) से मामला दर्ज करने की अनुमति मांगी थी।

याचिकाकर्ता का दावा: ‘संविधान विरोधी और दमनकारी है यह कानून’

अदालत में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता वकील सब्यसाची चटर्जी ने कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ का ध्यान आकर्षित करते हुए इस कानून का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत के समक्ष निम्नलिखित मुख्य दलीलें रखीं:

  • दमनकारी प्रकृति: यह कानून बेहद दमनकारी है और इसका दुरुपयोग नागरिकों के खिलाफ हो सकता है।
  • संवैधानिक अधिकारों का हनन: इस कानून की मूल धाराएं भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं।
  • तुरंत रोक की मांग: आम नागरिकों के अधिकारों और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इस कानून पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जानी चाहिए।

अदालत से हरी झंडी, लेकिन तत्काल सुनवाई से इनकार

वकील की दलीलें सुनने और मामले की गंभीरता को देखते हुए कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपोब्रत चक्रवर्ती ने जनहित याचिका दर्ज करने की अनुमति दे दी। अदालत के सूत्रों के अनुसार, अनुमति मिलने के तुरंत बाद मामला दर्ज करने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस मामले को ‘अति-आपातकालीन’ (Emergency) नहीं माना जाएगा और इस पर कोई विशेष त्वरित सुनवाई नहीं होगी। याचिका पूरी तरह पंजीकृत होने के बाद, अदालत की सामान्य कार्यसूची (कॉज लिस्ट) के क्रम के अनुसार ही इस पर नियमित सुनवाई की जाएगी।

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