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बंगाल के मुसलमान इस बार किसका साथ देंगे ? दरार की आहट या भरोसा अब भी कायम, तृणमूल की बढ़ी चिंता, जाने हकीकत

डेस्क। पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों में मुसलमानों की भूमिका बेहद अहम रही है। यह तबका आमतौर पर एकजुट होकर सत्तारूढ़ पार्टी का ही समर्थन करता रहा है। लेकिन इस बार एसआईआर के कारण भारी तादाद में कटने वाले. . .

डेस्क। पश्चिम बंगाल में होने वाले चुनावों में मुसलमानों की भूमिका बेहद अहम रही है। यह तबका आमतौर पर एकजुट होकर सत्तारूढ़ पार्टी का ही समर्थन करता रहा है। लेकिन इस बार एसआईआर के कारण भारी तादाद में कटने वाले नामों ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस का चुनावी समीकरण गड़बड़ा दिया है। इसलिए पहले चरण के मतदान से पहले राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहा है कि इस बार बंगाल के मुसलमान किसका साथ देंगे? क्या तृणमूल कांग्रेस का यह वोट बैंक अटूट रहेगा या फिर एसआईआर ने इसमें सेंध लगा दी है?

पहले चरण में कितनी मुस्लिम आबादी?

पहले चरण में 16 जिलों में फैली 152 सीटों पर मतदान होना है। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में 27.01 फीसदी मुस्लिम थे। अब यह आंकड़ा 30 फीसदी से ज्यादा होने का अनुमान है। राज्य के मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर और दक्षिण 24 परगना जिले में मुसलमान मतदाताओं की संख्या 40 प्रतिशत से ज्यादा है। कुछ इलाकों में तो यह और भी ज़्यादा है। मिसाल के तौर पर मुर्शिदाबाद में करीब 70 फीसदी और मालदा में 57 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। मुर्शिदाबाद और मालदा में विधानसभा की 34 सीटें हैं। यह जिले बांग्लादेश की सीमा से सटे हुए हैं। विधानसभा की 294 सीटों में से 100 से 105 सीटों पर इसी तबके के वोट निर्णायक हैं।
वर्ष 2006 तक राज्य के मुस्लिम वोट बैंक पर वाममोर्चा का कब्जा था। लेकिन उसके बाद यह तबका धीरे-धीरे ममता की तृणमूल कांग्रेस की ओर आकर्षित हुआ। वर्ष 2011, 2016 और 2021 में इसी वोट बैंक की बदौलत ममता सत्ता में आईं और बनी रहीं।

ममता सरकार की योजनाएँ

अपने इस वोट बैंक को अटूट रखने के लिए हाल के वर्षों में ममता अल्पसंख्यकों की सहायता के लिए दर्जनों योजनाएँ शुरू कर चुकी हैं। इनमें मदरसों को सरकारी सहायता, इस तबके के छात्रों के लिए स्कॉलरशिप और मौलवियों को आर्थिक मदद भी शामिल है। इसी वजह से भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दल उनके खिलाफ तुष्टिकरण की राजनीति के आरोप लगाते रहे हैं।

SIR में मुस्लिम नाम कटे

इस बार एसआईआर के दौरान भारी तादाद में मुसलमान वोटरों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। इस प्रक्रिया का विश्लेषण करने वाले सबर इंस्टीट्यूट ने बंगाल की दो सबसे अहम सीटों- नंदीग्राम और भवानीपुर में कटे नामों पर गहन शोध किया है। इसमें कहा गया है कि नंदीग्राम में मुसलमानों की आबादी 26 फ़ीसदी है। लेकिन एसआईआर के दौरान जो नाम कटे हैं उनमें 95 फीसदी मुस्लिम शामिल हैं। इसी तरह भवानीपुर इलाके में 20 फीसदी मुसलमान रहते हैं। लेकिन यहां मतदाता सूची से कटे नामों में 40 फीसदी इसी तबके के हैं।
विधानसभा में विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कोलकाता की भवानीपुर सीट से ही दोबारा मैदान में हैं।

मुर्शिदाबाद में विधानसभा में 22 सीटें

देश में मुसलमानों की आबादी वाले सबसे बड़े जिले में शुमार मुर्शिदाबाद में विधानसभा की 22 सीटें हैं। वर्ष 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने इनमें से 20 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसी तरह भागीरथी के पार बसे मालदा की 12 में आठ सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार विजयी रहे थे। इससे मुस्लिम वोटरों पर तृणमूल कांग्रेस की मजबूत पकड़ का पता चलता है।
लेकिन वक्फ संशोधन विधेयक को लागू करने के ममता बनर्जी सरकार के फैसले से इस तबके में नाराजगी बढ़ी है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मुर्शिदाबाद की 14 विधानसभा सीटों पर ही तृणमूल को बढ़त मिली थी। इसी तरह वह मालदा की सभी 12 विधानसभा सीटों पर भी पिछड़ी रही थी।
हाल में तृणमूल कांग्रेस छोड़कर कांग्रेस में शामिल होने वाली मौसम नूर का दावा है कि मुसलमान अब पुरानी पार्टी यानी कांग्रेस की ओर लौट रहे हैं। ममता सरकार से उनका मोहभंग हो चुका है। नूर का आरोप है कि मौजूदा सरकार मुसलमानों के हितों की रक्षा करने में नाकाम रही है। इस बार इस तबके के लोग भारी तादाद में कांग्रेस को समर्थन देंगे।
लेकिन दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि एसआईआर के जरिए बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से नाम कटने की वजह से यह तबका तृणमूल कांग्रेस के प्रति पहले के मुकाबले ज्यादा लामबंद नजर आ रहा है। ममता बनर्जी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर मामले के कारण लाखों लोगों के नाम सूची से बाहर होने से बच गए।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एसआईआर के जरिए बड़े पैमाने पर कटे नामों ने तृणमूल कांग्रेस के इस मजबूत वोट बैंक ने सेंध लगने का खतरा पैदा कर दिया है। ममता बनर्जी भी इस ख़तरे से वाकिफ हैं। यही वजह है कि इस बार उन्होंने मुस्लिम-बहुल इलाक़ों में चुनाव प्रचार पर खास ध्यान दिया है। लेकिन क्या उनका यह वोट बैंक अटूट रहेगा या भाजपा इसमें सेंध लगाने में कामयाब रहेगी, इस सवाल का जवाब तो चार मई को ही मिलेगा।

91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हुए हैं

एसआईआर के बाद लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटने की चर्चा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। आंकड़ों के मुताबिक, लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम सूची से बाहर हुए हैं। इनमें से 34 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि राज्य में उनकी जनसंख्या का हिस्सा 27 फीसदी है। मुस्लिम मतदाताओं की हिस्सेदारी में 2.5 से 3 फीसदी तक की कमी का असर दिख रहा है। 2021 में तृणमूल और भाजपा के बीच वोट शेयर का अंतर करीब 8 फीसदी था। यदि तृणमूल के इस कोर सपोर्ट में 3 फीसदी की गिरावट आती है और एंटी-इन्कंबेंसी भी जुड़ती है, तो कई सीटों पर मुकाबला बेहद करीबी हो सकता है।
इसे ऐसे समझें कि 2021 में तृणमूल ने 37 सीटें 5 प्रतिशत से कम के अंतर से जीती थीं। ऐसे में, यदि किसी सीट पर 10 से 20 हजार मुस्लिम वोट कम होते हैं, तो वह सीधे तौर पर तृणमूल की जीत के अंतर पर चोट होगी। जैसे नादिया की करीमपुर (करीब 12 हजार), मुर्शिदाबाद की डोमकल (करीब 47 हजार) और कई अन्य सीटें, जहां 5 फीसदी से कम अंतर रहा था। भवानीपुर जैसी सीट, जहां से ममता बनर्जी खुद चुनाव लड़ चुकी हैं, वहां भी मतदाता सूची में 40 हजार से ज्यादा वोट कटे हैं। इस बदलाव को लेकर राजनीतिक हलचल है।

उत्तर बंगाल : दादा और स्थानीय अस्मिता

मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर में मुकाबला और दिलचस्प हो गया है। यहां अधीर रंजन चौधरी का प्रभाव अब भी कायम है। मुर्शिदाबाद में मछली बेचने वाले मोहम्मद करीब मौला कहते हैं कि हमारे लिए अधीर दादा बेहतर हैं। वह खड़े होते हैं, हमारी बात करते हैं। वहीं, शिक्षक अनवर हुसैन विश्वास का नजरिया मिश्रित है और वह कहते हैं कि प्रदेश के लिए तो ममता बनर्जी को जिताना है, लेकिन हमारे यहां बहरामपुर में दादा का रहना जरूरी है। वैसे इस इलाके में मौसम नूर का भी प्रभाव साफ दिखता है। यह दोहरी सोच बताती है कि राज्य और स्थानीय स्तर पर वोटिंग का पैटर्न अलग-अलग हो सकता है।

भांगड़ : बदलते मिजाज की जमीनी तस्वीर

दक्षिण 24 परगना की भांगड़ सीट इस बदलाव का सबसे जीवंत उदाहरण बनकर उभरी है। यहां से नौशाद सिद्दीकी की जीत ने 2021 में ही संकेत दे दिया था कि मुस्लिम वोट अब पूरी तरह एक दिशा में नहीं बह रहा। जमीनी हकीकत इसे और स्पष्ट करती है। दक्षिण के भांगड़ से निकलकर नौशाद सिद्दीकी की आईएसएफ अब मालदा, नादिया और उत्तर 24 परगना की कम से कम 20-25 सीटों पर प्रभावी हो गई है।
वाम मोर्चे के साथ उनका सीट-शेयरिंग समझौता मुस्लिम युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है। भांगड़ में तृणमूल समर्थक नुरुल अमीन नस्कर और उनके मित्र अब्दुल करीम हक से अमर उजाला ने बात की। दोनों मानते हैं कि नौशाद सिद्दीकी का प्रभाव यहां बढ़ा है, इसे नकारा नहीं जा सकता।
सब्जी बेचने वाली आयशा खातून मंडल खुलकर दीदी के समर्थन में बोलती हैं, लेकिन साथ ही जोड़ती हैं कि वोट तो वहीं करेंगे, जहां पूरा समाज जाएगा। यानी व्यक्तिगत पसंद और सामुदायिक रुझान, दोनों के बीच संतुलन साधने की ये कोशिश तृणमूल के लिए अच्छा संकेत नहीं।

डर और विकल्प के बीच वोटर

मौलाना अब्दुल रहमान शेख कहते हैं कि सबसे बड़ा खतरा भाजपा है, उसे दीदी ही दूर रख सकती हैं। हालांकि वे यह भी मानते हैं कि अब मुसलमानों में भी कुछ लोग अलग तरह से सोचने लगे हैं। यानी भाजपा का डर अब भी एकजुटता का कारक है, लेकिन विकल्पों की तलाश भी शुरू हो चुकी है।

हुमायूं कबीर : अलग राह, वही सवाल

कभी तृणमूल में रहे हुमायूं कबीर अब अपनी अलग पार्टी बना चुके हैं। लगातार यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि मुस्लिम समाज को केवल प्रतीकात्मक राजनीति नहीं, बल्कि वास्तविक हिस्सेदारी चाहिए। कबीर का यह बयान कि ममता बनर्जी, ईद की नमाज पढ़ने से मुसलमानों का पेट नहीं भरता। उन्हें मजबूत करना तो दूर, जो दो मुस्लिम मंत्री फिरहात हकीम और सिदिकुल्ला चौधरी हैं, उनके पास भी कोई शक्ति नहीं है। उनकी यह लाइन विपक्ष को तृणमूल के खिलाफ एक वैचारिक आधार तैयार कर रही है।

दरार दिख रही, दिशा तय होना बाकी

भांगड़ की गलियों से लेकर मुर्शिदाबाद के बाजारों तक जो संकेत मिल रहे हैं, वे साफ बताते हैं कि मुस्लिम वोट बैंक अब पहले जैसा एकमुश्त नहीं रहा। अब यह वोटर संतुलन साध रहा है, राज्य स्तर पर स्थिरता और स्थानीय स्तर पर प्रतिनिधित्व के बीच। 2026 का चुनाव इसी बदलते मिजाज की असली परीक्षा होगा।

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