Home » देश » आज देशभर में मनाई जा रही है बकरीद, अमन के साथ अदा हुई नमाज: जानें इतिहास और धार्मिक महत्व

आज देशभर में मनाई जा रही है बकरीद, अमन के साथ अदा हुई नमाज: जानें इतिहास और धार्मिक महत्व

डेस्क। आज पूरे देश में ईद-उल-अजहा मनाई जा रही है। भारत में इसे बकरीद भी कहा जाता है, जो कि इस्लाम धर्म का सबसे खास त्योहार है। ईद-उल-अजहा को कुर्बानी की ईद के नाम से भी जाना जाना जाता है. . .

डेस्क। आज पूरे देश में ईद-उल-अजहा मनाई जा रही है। भारत में इसे बकरीद भी कहा जाता है, जो कि इस्लाम धर्म का सबसे खास त्योहार है। ईद-उल-अजहा को कुर्बानी की ईद के नाम से भी जाना जाना जाता है क्योंकि इस दिन जानवर की कुर्बानी दी जाती है। यह त्योहार इस्लामी कैलेंडर (हिजरी) के आखिरी महीने ‘जिल-हिज्जा’ की 10 तारीख को मनाया जाता है।यह मुख्य रूप से त्याग, समर्पण और अल्लाह के प्रति अटूट विश्वास का पर्व है।

ईद-उल-अजहा का इतिहास और महत्व

इस्लामिक मान्यताओं के मुताबिक, ईद-उल-अजहा का सीधा संबंध हजरत इब्राहिम (अलैहिस्सलाम) और उनके बेटे हजरत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) के एक महान इम्तिहान से है। मान्यता है कि अल्लाह ने हजरत इब्राहिम के ख्वाब में आकर उनकी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने का हुक्म दिया था। इब्राहिम अलैहिस्सलाम के लिए उनके बेटे हजरत इस्माइल सबसे अजीज थे।
अल्लाह की रजा के लिए हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने को तैयार हो गए थे. जैसे ही उन्होंने अपने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाई, अल्लाह ने उनके जज्बे और ईमानदारी को कुबूल कर लिया और जिब्रईल (फरिश्ते) के जरिए हजरत इस्माइल की जगह एक दुंबे (भेड़) को रख दिया था. इसी ऐतिहासिक वाकये की याद में हर साल दुनिया भर के मुसलमान अल्लाह की राह में हलाल जानवरों की कुर्बानी देते हैं, जिसे ‘सुन्नत-ए-इब्राहिमी’ भी कहा जाता है.

बकरीद से हज का संबंध

ईद-उल-अजहा का त्योहार हज यात्रा के समापन का भी प्रतीक होता है. मक्का में हज के नियम पूरे करने के बाद, दुनिया भर के हाजी और अन्य मुसलमान इस दिन अपनी इबादत मुकम्मल करते हैं.

कैसे मनाया जाता है यह त्योहार?

ईद के दिन सुबह सभी मुसलमान नए या साफ-सुथरे कपड़े पहनकर ईदगाह या मस्जिदों में इकट्ठा होते हैं और ईद-उल-अजहा की दो रकात विशेष नमाज (वाजिब) अदा करते हैं. नमाज के बाद अमन-चैन और खुशहाली की दुआएं मांगी जाती हैं. नमाज के बाद बकरे, भेड़, ऊंट या अन्य हलाल जानवरों की कुर्बानी दी जाती है. इस्लाम में कुर्बानी के गोश्त को सिर्फ अपने पास रखने की इजाजत नहीं है. इसके सामाजिक संदेश को मजबूत करने के लिए गोश्त को सिर्फ अपने पास रखने की इजाजत नहीं है. इसके सामाजिक संदेश को मजबूत करने के लिए गोश्त को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है.

पहला हिस्सा: गरीबों और और जरूरतमंदों के लिए.
दूसरा हिस्सा: रिश्तेदारों, दोस्तों और पड़ोसियों के लिए.
तीसरा हिस्सा: अपने परिवार के लिए

Web Stories
 
इन लोगों को नहीं खाना चाहिए मोरिंगा शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए खाएं ये वेजेटेरियन फूड्स हल्दी का पानी पीने से दूर रहती हैं ये परेशानियां सकट चौथ व्रत पर भूल से भी न करें ये गलतियां बुध के गोचर से इन राशियों का शुरू होगा गोल्डन टाइम