नई दिल्ली । भारत की निजी स्पेस कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस ने आज अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ दिया है। कंपनी का विक्रम-1 रॉकेट श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से सफलतापूर्वक लॉन्च हो गया है। यह भारत की निजी क्षेत्र की पहली ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्चिंग है, जिसने पूरे देश को गर्व का मौका दिया है। विक्रम-1 रॉकेट सुबह करीब 11:30 बजे लॉन्च किया गया। रॉकेट ने निर्धारित समय पर अपने सभी चरण पूरे किए और उपग्रह को सही ऑर्बिट में स्थापित कर दिया। इसरो के वैज्ञानिकों ने लॉन्च की पूरी प्रक्रिया को मॉनिटर किया। इस ऐतिहासिक मिशन का नाम ‘आगमन’ रखा गया है। यह लॉन्च सिर्फ स्काईरूट के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के पूरे प्राइवेट स्पेस सेक्टर के लिए एक युगांतरकारी घटना है। साल 2020 में सरकार ने स्पेस सेक्टर में जो क्रांतिकारी बदलाव किए थे, उसी दूरदर्शी नीति के कारण आज निजी कंपनियों को रॉकेट, सैटेलाइट और लॉन्च सर्विस पर काम करने की अनुमति मिली और भारत ने यह ऐतिहासिक मुकाम हासिल किया।
साल 2022 के सब-ऑर्बिटल सफर से 450 किमी ऊंचे ऑर्बिट तक का अभूतपूर्व विकास
स्काईरूट एयरोस्पेस ने इससे पहले साल 2022 में विक्रम-S नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च कर इतिहास की नींव रखी थी। लेकिन उस शुरुआती मिशन में सैटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित नहीं किया गया था। इस बार का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा और चुनौतीपूर्ण था। विक्रम-1 ने कई ग्राहकों के छोटे सैटेलाइट को पृथ्वी से करीब 450 किलोमीटर ऊंची लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया है। यह स्काईरूट के तीन तय डेवलपमेंट मिशनों में से पहला चरण था। इस ऐतिहासिक सफलता के बाद अब इस रॉकेट को नियमित कमर्शियल लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार किया जाएगा।
सब-ऑर्बिटल बनाम ऑर्बिटल: जानिए क्यों यह मिशन भारत के लिए एक बड़ी तकनीकी छलांग है
अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में सब-ऑर्बिटल और ऑर्बिटल रॉकेट के बीच का अंतर बेहद महत्वपूर्ण रहा है। सब-ऑर्बिटल रॉकेट सिर्फ अंतरिक्ष की सीमा तक जाकर वापस धरती पर आ जाता है। इसके विपरीत, एक ऑर्बिटल रॉकेट सैटेलाइट को इतनी तीव्र रफ्तार देता है कि वह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करते हुए उसकी कक्षा में लगातार घूमता रहता है। विक्रम-1 की इस सफलता के साथ ही स्काईरूट यह कारनामा करने वाली भारत की पहली प्राइवेट कंपनी बन गई है। अगर बात विक्रम-1 की बनावट की करें, तो यह आधुनिक तकनीक से लैस चार चरणों वाला रॉकेट है। इसके पहले तीन चरणों में ठोस (सॉलिड) ईंधन का इस्तेमाल किया गया है, जबकि इसके चौथे चरण में लिक्विड फ्यूल इंजन लगाया गया है। इस इंजन की खासियत यह है कि इसे जरूरत पड़ने पर अंतरिक्ष में दोबारा चालू किया जा सकता है, जिससे सैटेलाइट को उसकी तय ऑर्बिट में ज्यादा सटीकता के साथ स्थापित करने में मदद मिलती है। इसे विशेष रूप से छोटे सैटेलाइट्स के बाजार को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
इसरो के पूर्व इंजीनियरों का सपना और 2018 से शुरू हुआ एक ऐतिहासिक सफर
इस ऐतिहासिक सफलता की कहानी साल 2018 में शुरू हुई थी, जब इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना की थी। साल 2020 में जब भारत सरकार ने अंतरिक्ष क्षेत्र के दरवाजे निजी भागीदारी के लिए खोले, तब इस कंपनी ने देश के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट को साकार करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। आज विक्रम-1 की यह कामयाबी उसी 8 साल लंबे सफर का सबसे गौरवशाली पड़ाव है। इस मिशन के सफल होने से न सिर्फ भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर की क्षमता साबित हुई है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारत अब और भी बड़े कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च मार्केट पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश करने के लिए तैयार है।