Home » मनोरंजन » ‘बंदर’ रिव्यू: बॉबी देओल ने दी करियर की बेस्ट परफॉरमेंस, देखें ट्रेलर, जाने फिल्म की कहानी

‘बंदर’ रिव्यू: बॉबी देओल ने दी करियर की बेस्ट परफॉरमेंस, देखें ट्रेलर, जाने फिल्म की कहानी

मूवी रिव्यू: बंदरAuthored by: रेखा खानProduced by: स्वपनल सोनलऐक्टर : बॉबी देओल,सान्या मल्होत्रा,सपना पब्बी,सबा आजाद,इंद्रजीत सुकुमारन,आर बी शेट्टी,जितेंद्र जोशीश्रेणी :Hindi, Film-Noir, Thrillerडायरेक्टर :अनुराग कश्यपअवधि : 2 Hrs 20 Min डेस्क। आज के दौर में डेटिंग ऐप्स पर एक राइट स्वाइप. . .

मूवी रिव्यू: बंदर
Authored by: रेखा खान
Produced by: स्वपनल सोनल
ऐक्टर : बॉबी देओल,सान्या मल्होत्रा,सपना पब्बी,सबा आजाद,इंद्रजीत सुकुमारन,आर बी शेट्टी,जितेंद्र जोशी
श्रेणी :Hindi, Film-Noir, Thriller
डायरेक्टर :अनुराग कश्यप
अवधि : 2 Hrs 20 Min

डेस्क। आज के दौर में डेटिंग ऐप्स पर एक राइट स्वाइप के साथ किसी भी रिश्ते की शुरुआत करना कितना आसान हो गया है। लेकिन मैसेजिंग से लेकर डेटिंग तक का यह शॉर्टकट कब आपके गले का फंदा बन जाए, पता ही नहीं चलता। कब कोई इस सहज-से लगने वाले रिश्ते को महज दिल्लगी नहीं, बल्कि दिल का मामला बना बैठे और फिर बात जुनून तक पहुंच जाए, कहना मुश्किल है। ऐसे में आप अनजाने ही एक ऐसे दलदल में फंस सकते हैं, जहां से वापसी शायद मुमकिन न हो। आए दिन असल जिंदगी में भी हम ऐसी कई खबरों से रूबरू होते रहते हैं। अपने चिर-परिचित तेवर में लौटे निर्देशक अनुराग कश्यप इसी दिलचस्‍प विषय पर एक ग्रिपिंग नियो-नॉयर थ्रिलर ‘बंदर’ लेकर आए हैं, जो डेटिंग ऐप्‍स के इसी अंधेरे सच की पड़ताल करती है। फिल्म दिखाती है कि एक अभियुक्त को सच्चाई सामने आने से पहले ही अपराधी मान लेना, उस इंसान की जिंदगी का कीचड़ बन जाता है, जिसमें वह ताउम्र धंसता रहता है।

‘बंदर’ मूवी की कहानी

कहानी की शुरुआत एक उदास नोट पर होती है, जहां एक समय का टीवी स्टार समर मेहरा (बॉबी देओल) अभिनय की जमीन पर पैर जमाए रखने की जद्दोजहद में लगा हुआ है। पचास की दहलीज पार कर चुका समर अपनी कम उम्र की गर्लफ्रेंड खुशी (सबा आजाद) को यकीन दिलाता रहता है कि उसे फिल्म में बड़ा ब्रेक मिलने वाला है। लेकिन असल में पैसों की तंगी और तमाम तरह की बीमारियों से जूझने वाले समर की हालत खस्ता हो चुकी है। एक दिन उसकी जिंदगी में तब तूफान आ जाता है, जब अचानक पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेती है।
समर को पता चलता है कि उस पर उसकी एक्स गर्लफ्रेंड गायत्री (सपना पब्बी) ने रेप का इल्जाम लगाया है। पहले तो पुलिस उससे केस को रफा-दफा करने के लिए ₹20 लाख की मोटी रकम की मांग करती है, लेकिन समर खुद को बेकसूर कहते हुए रिश्वत देने से मना कर देता है। अब इसके बाद समर की जिंदगी और कहानी पूरी तरह बदल जाती है। समर को जेल भेजा जाता है। वह कानून, कारावास, सिस्‍टम, साजिश और बेबसी की एक ऐसी अंधेरी सुरंग में फंस जाता है, जहां पर उसके लिए रोशनी की एक भी किरण मौजूद नहीं है।

‘बंदर’ मूवी ट्रेलर

कॉम्प्लेक्स, डार्क और हार्ड हिटिंग विषयों के महारथी अनुराग कश्यप की ‘बंदर’ बेचैन कर देने वाले विषय पर आधारित है। फिल्म दिखाती है कि एक ढलते हुए स्टार पर रेप का संगीन आरोप लगने के बाद सेलिब्रिटी कल्चर के दौर में कोई व्यक्ति कैसे कानून, मीडिया और पब्लिक ओपिनियन के बीच पिसकर रह जाता है। यह फिल्म एक ओर घुटन पैदा करती है, तो दूसरी ओर लगातार सोचने पर मजबूर करती है। कहानी भले ही एक कथित झूठे रेप केस के इर्द-गिर्द घूमती हो, लेकिन इसकी असली ताकत ह्यूमन कॉम्प्लेक्ससिटीज की पड़ताल में है।
गायत्री अपने ‘रिजेक्शन’ और ‘इस्तेमाल किए जाने’ की भावना को स्वीकार नहीं कर पाती, जो उसे बदले की राह पर धकेल देती है। जबकि जटिल चरित्र के नायक के लिए यह आत्मबोध और आत्म विश्लेषण की यात्रा बन जाती है। जब समर यह स्वीकार करता है, ‘मैं गायत्री को सही तरीके से हैंडल नहीं कर पाया’, तो फिल्म केवल आरोप-प्रत्यारोप की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि रिश्तों और जिम्मेदारियों पर भी सवाल उठाती है।

अटपटा-सा लगने वाला शीर्षक ‘बंदर’

फिल्म का अटपटा-सा लगने वाला शीर्षक ‘बंदर’ आगे चलकर एक बेहद प्रभावशाली रूपक बनकर उभरता है। कहानी का नायक इस व्यवस्था, कानून, समाज और अपनी एक्स गर्लफ्रेंड के इशारों पर नाचने वाले ‘बंदर’ में बदल जाता है, जिसकी अपनी इच्छा और पहचान धीरे-धीरे खत्म होती जाती है।
फिल्म का पहला भाग मजबूत है। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ हद तक दोहराव का शिकार होती है और रफ्तार भी धीमी पड़ती है। जेल में कैदियों की दुर्दशा और भ्रष्ट व्यवस्था को हम ‘चांदनी बार’, ‘जेल’, ‘तीन दीवारें’ और ‘यूटी 69’ जैसी फिल्मों में देख चुके हैं, लेकिन अनुराग यहां अपने अजीबोगरीब किरदारों के जरिए इन्हें अलग करने की कोशिश करते हैं। सुदीप शर्मा और अभिषेक बनर्जी की लिखावट प्रभावशाली है, हालांकि कुछ संवाद गाली-गलौज की सीमा से आगे निकल जाते हैं। सईद शाह रिज़वी का कैमरा वर्क बेचैनी, डर और घुटन को लगातार महसूस कराता है। शिवहरि वर्मा के संगीत में ‘पिंजरा’ जैसा गीत विडंबनाओं पर तीखा प्रहार करते हैं, जबकि बैकग्राउंड स्कोर पूरे नैरेटिव को मजबूती देता है।
फिल्‍म का क्लाइमैक्स इसे एक शॉक वैल्यू देता है। हालांकि फिल्म में एडिटिंग की गुंजाइश इसे और धार दे सकती थी। नैतिक रूप से जटिल यह फिल्म हल्‍का-फुल्‍का मनोरंजन की चाह रखने वालों को शायद न भाए, लेकिन यह उन्‍हें भी सोचने पर जरूर मजबूर करेगी।

Web Stories
 
इन लोगों को नहीं खाना चाहिए मोरिंगा शरीर में प्रोटीन की कमी को पूरा करने के लिए खाएं ये वेजेटेरियन फूड्स हल्दी का पानी पीने से दूर रहती हैं ये परेशानियां सकट चौथ व्रत पर भूल से भी न करें ये गलतियां बुध के गोचर से इन राशियों का शुरू होगा गोल्डन टाइम