आज देशभर में शिक्षा व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। ऐसे माहौल में निर्देशक हिमांक गौर की वेब सीरीज ‘आदर्श बाल विद्यालय’ सरकारी स्कूलों की बदहाल व्यवस्था, सीमित संसाधनों, शिक्षकों की चुनौतियों और बच्चों की मासूम दुनिया को हास्य के जरिए बड़े प्रभावी अंदाज में पेश करती है। करीब 40-40 मिनट के सात एपिसोड वाली यह सीरीज मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा व्यवस्था की कई परतें भी खोलती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसकी शानदार स्टारकास्ट है, जिसमें के.के. मेनन, अर्चना पूरन सिंह, देवेन भोजानी, नवीन कस्तूरिया, अभिमन्यु सिंह और प्रसन्ना बिष्ट जैसे दमदार कलाकार शामिल हैं।
स्कूल का नाम ‘आदर्श’, लेकिन हालात बिल्कुल उलट
कहानी दिल्ली के टिंकी टोली स्थित सरकारी स्कूल ‘आदर्श बाल विद्यालय’ से शुरू होती है। नाम भले ही आदर्श हो, लेकिन स्कूल की हालत जर्जर है। भवन टूट-फूट चुका है, मोहल्ले वाले परिसर में कपड़े सुखाते हैं और स्थानीय विधायक इसे अपने निजी अड्डे की तरह इस्तेमाल करता है। स्कूल का माहौल भी कुछ खास नहीं है। छात्र पढ़ाई से ज्यादा मस्ती में रहते हैं, जबकि प्रिंसिपल ज्ञानेश्वर त्रिपाठी (के.के. मेनन) अपनी जिम्मेदारियों से ज्यादा बच्चों के साथ क्रिकेट खेलने में व्यस्त नजर आते हैं।
कैम्ब्रिज का सपना और बदलती सोच
कहानी में दिलचस्प मोड़ तब आता है, जब शिक्षा विभाग घोषणा करता है कि यदि यह स्कूल 10वीं बोर्ड परीक्षा के नतीजों के आधार पर दिल्ली के टॉप-10 सरकारी स्कूलों में शामिल हो जाता है, तो प्रिंसिपल और उनकी पत्नी को कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में विशेष प्रशिक्षण का मौका मिलेगा। पत्नी सुषमा (प्राची शाह) का विदेश जाने का सपना पूरा करने के लिए ज्ञानेश्वर इस लगभग असंभव चुनौती को स्वीकार कर लेते हैं। अब उन्हें लापरवाह छात्रों को पढ़ाई के लिए तैयार करना है, निराश शिक्षकों में उत्साह जगाना है और राजनीति के दखल से भी मुकाबला करना है।
हंसी के पीछे छिपे हैं कई कड़वे सच
सीरीज की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह शिक्षा व्यवस्था की गंभीर समस्याओं को भारी-भरकम भाषणों की बजाय हल्के-फुल्के हास्य के जरिए सामने लाती है। चाहे प्रजनन शिक्षा को मजेदार गीत के जरिए समझाने की बात हो, मिड-डे मील की खीर का महत्व दिखाना हो, छात्रों को अनुशासन सिखाने के पुराने तरीकों पर सवाल उठाना हो या फिर नाम की गलती से साइकिल का इनाम गलत छात्र तक पहुंच जाना—हर घटना दर्शकों को हंसाने के साथ सोचने पर भी मजबूर करती है। सीरीज यह भी दिखाती है कि कैसे कुछ पैसों के लालच में स्कूली बच्चों का इस्तेमाल राजनीतिक रैलियों में किया जाता है। व्यंग्य और यथार्थ का यह मेल कहानी को खास बना देता है।
इंटरवल के बाद थोड़ी धीमी पड़ती है रफ्तार
शुरुआती चार एपिसोड बेहद रोचक और तेज गति से आगे बढ़ते हैं। हालांकि, इसके बाद कहानी कुछ जगहों पर धीमी महसूस होती है। कई हास्य दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं, जिससे कहानी अपने मुख्य उद्देश्य से थोड़ा भटकती नजर आती है।
फिर भी नवीन कस्तूरिया, प्रसन्ना बिष्ट, अभिमन्यु सिंह, अन्नपूर्णा सोनी और अजीतेश गुप्ता जैसे कलाकार अपने दिलचस्प किरदारों से मनोरंजन का स्तर बनाए रखते हैं। स्कूल पर आधारित होने के बावजूद सीरीज कहीं भी उपदेशात्मक नहीं लगती।
के.के. मेनन ने दिखाया कॉमेडी का नया रंग
गंभीर किरदारों के लिए पहचाने जाने वाले के.के. मेनन इस बार कॉमिक अंदाज में शानदार नजर आते हैं। एक परेशान, लेकिन दिल के अच्छे प्रिंसिपल के रूप में उनकी टाइमिंग कई दृश्यों को यादगार बना देती है। अर्चना पूरन सिंह राजनीतिक दांव-पेंच में माहिर उर्मिला के किरदार में प्रभाव छोड़ती हैं। देवेन भोजानी दबंग विधायक गोल्डी के रूप में जंचते हैं, जबकि नवीन कस्तूरिया एक संवेदनशील स्टूडेंट काउंसलर के रूप में प्रभावित करते हैं। अभिमन्यु सिंह अनुशासनप्रिय शिक्षक के किरदार में संतुलित अभिनय करते हैं। प्रसन्ना बिष्ट की सादगी, अन्नपूर्णा सोनी की सहजता और अजीतेश गुप्ता की टूटी-फूटी अंग्रेजी कई मजेदार पल लेकर आती है। प्राची शाह भी प्रिंसिपल की पत्नी के रूप में कहानी को भावनात्मक स्पर्श देती हैं। बाल कलाकारों का अभिनय भी पूरी तरह स्वाभाविक और प्रभावशाली है।
देखें या छोड़ दें?
अगर आपको ‘पंचायत’, ‘गुल्लक’ या हल्के-फुल्के व्यंग्य के साथ सामाजिक मुद्दों पर बनी कहानियां पसंद हैं, तो ‘आदर्श बाल विद्यालय’ आपके लिए एक अच्छी पसंद साबित हो सकती है। यह सीरीज न सिर्फ हंसाती है, बल्कि सरकारी स्कूलों की वास्तविक चुनौतियों और शिक्षा व्यवस्था की खामियों पर भी सोचने के लिए मजबूर करती है।
रेटिंग: ★★★★☆ (4/5)
मनोरंजन, व्यंग्य और सामाजिक संदेश का संतुलित मिश्रण, जिसे पूरे परिवार के साथ देखा जा सकता है।